
भारतीय रसोई में लहसुन का खास स्थान है. यह न केवल खाने का स्वाद बढ़ाता है, बल्कि किसानों की आय और मसाला अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. लेकिन इन दिनों एक बार फिर चीनी लहसुन की अवैध आवक चर्चा में है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल सस्ते आयात का मामला नहीं, बल्कि देश की कृषि जैव-सुरक्षा, किसानों के हित और उपभोक्ता सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है.
समस्तीपुर स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के पौध सुरक्षा विभाग के विशेषज्ञ डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, भारत में चीन से लहसुन के आयात पर प्रतिबंध 2014 से नहीं बल्कि 6 सितंबर 2005 से लागू है.
यह प्रतिबंध इसलिए लगाया गया था क्योंकि चीन से आने वाली लहसुन की खेपों में Embellisia alli और Urocystis cepulae जैसे संगरोध महत्व के फफूंद बार-बार पाए गए थे. ये रोगजनक भारतीय फसलों के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं. इसी वजह से कृषि उत्पादों के आयात को पादप संगरोध नियमों के तहत नियंत्रित किया जाता है.
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि समस्या अभी भी खत्म नहीं हुई है. सीमा शुल्क विभाग और राजस्व खुफिया निदेशालय ने वर्ष 2023-24 में करीब 546 मीट्रिक टन और 2024-25 में 507 मीट्रिक टन चीनी लहसुन जब्त किया.
इसके अलावा चेन्नई के बाजारों में भी चीनी लहसुन बिकने की शिकायतें सामने आईं, जिसके बाद निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए. इससे साफ है कि प्रतिबंध के बावजूद अवैध रास्तों से लहसुन की आवक पूरी तरह नहीं रुकी है.
विशेषज्ञों के मुताबिक किसी विदेशी कृषि उत्पाद के साथ नया कीट, रोग या फफूंद देश में प्रवेश कर जाए तो उसे खत्म करना बेहद मुश्किल और महंगा हो सकता है.
यदि प्रतिबंधित लहसुन बिना जांच के बाजार में पहुंचता है तो वह पादप संगरोध, खाद्य सुरक्षा और सीमा शुल्क परीक्षण से बच जाता है. इससे लहसुन के साथ-साथ प्याज और अन्य एलियम वर्ग की फसलों पर भी खतरा बढ़ सकता है.
यही वजह है कि सरकार और कृषि वैज्ञानिक इस मुद्दे को केवल व्यापार नहीं बल्कि राष्ट्रीय कृषि सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं.
भारत दुनिया के प्रमुख लहसुन उत्पादकों में शामिल है. मसाला क्षेत्र से जुड़े ताजा अनुमानों के अनुसार वर्ष 2025-26 में देश में लगभग 4.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लहसुन की खेती होने और 38.09 लाख टन उत्पादन का अनुमान है.
वहीं 2024-25 में लगभग 35.65 लाख टन उत्पादन हुआ था. यानी एक साल में करीब 6.8 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्वालिटी वाले बीज, बेहतर भंडारण, प्रोसेसिंग, किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और निर्यात व्यवस्था को मजबूत किया जाए तो भारतीय लहसुन घरेलू मांग के साथ वैश्विक बाजार में भी अपनी मजबूत पहचान बना सकता है.
लहसुन में एलिन, एलिसिन और अन्य सल्फर यौगिक पाए जाते हैं, जिन्हें स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है. कई वैज्ञानिक अध्ययनों में इसके एंटीऑक्सीडेंट और हृदय स्वास्थ्य से जुड़े संभावित फायदे बताए गए हैं.
हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यह कहना सही नहीं होगा कि हर चीनी लहसुन में खतरनाक रसायन होते हैं या वह कैंसर पैदा करता है. इसी तरह केवल भारतीय होने के कारण किसी लहसुन को पूरी तरह रसायन-मुक्त भी नहीं माना जा सकता. उत्पाद की सुरक्षा उसकी खेती, भंडारण और क्वालिटी नियंत्रण पर निर्भर करती है.
बाजार में अक्सर माना जाता है कि बहुत बड़ा आकार, ज्यादा सफेद रंग और एक जैसे दिखने वाली गांठें चीनी लहसुन की पहचान हैं. जबकि भारतीय लहसुन अपेक्षाकृत छोटा, अधिक तीखी गंध वाला और हल्के गुलाबी या भूरे छिलके वाला माना जाता है.
लेकिन कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ आकार या रंग देखकर किसी लहसुन का मूल देश तय करना संभव नहीं है. भारत में भी कई किस्में और आकार उपलब्ध हैं.
इसलिए उपभोक्ताओं को सलाह दी जाती है कि वे विश्वसनीय विक्रेता से ही खरीदारी करें और पैक्ड उत्पादों पर स्रोत और विक्रेता की जानकारी जरूर देखें.
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय लहसुन खरीदना केवल देशभक्ति का विषय नहीं है. इससे किसानों की आय बढ़ती है, ग्रामीण रोजगार को समर्थन मिलता है और वैध कृषि सप्लाई चेन मजबूत होती है.
स्थानीय उत्पाद खरीदने से न सिर्फ किसानों को बेहतर बाजार मिलता है, बल्कि देश की जैव-सुरक्षा और कृषि व्यवस्था को भी मजबूती मिलती है. यही वजह है कि कृषि वैज्ञानिक अवैध आयात पर सख्ती और उपभोक्ताओं में जागरुकता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं.