Explained: अल नीनो के बीच धान की ओर झुकाव, क्या बदल रहा है खेती का ट्रेंड?

Explained: अल नीनो के बीच धान की ओर झुकाव, क्या बदल रहा है खेती का ट्रेंड?

अल नीनो और कमजोर मॉनसून की आशंका के बीच भी देश में धान की बुवाई बढ़ रही है. किसान कपास और गन्ने जैसी फसलों से दूरी बनाकर धान की ओर झुक रहे हैं. इसके पीछे सरकारी खरीद की गारंटी, बाजार जोखिम और पानी से जुड़े कई अहम कारण सामने आ रहे हैं.

El Nino India farmingEl Nino India farming
रवि कांत सिंह
  • New Delhi,
  • Jun 18, 2026,
  • Updated Jun 18, 2026, 6:44 PM IST

देश में अल नीनो की सक्रियता और मॉनसून में देरी की आशंकाओं के बीच खेती का पैटर्न दिलचस्प मोड़ लेता दिख रहा है. जहां आम तौर पर ऐसी परिस्थितियों में पानी पर निर्भर फसलें पीछे छूटती हैं, वहीं इस बार तस्वीर कुछ अलग है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, खरीफ सीजन की कुल बुवाई में करीब 3.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन धान और मोटे अनाज का रकबा पिछले साल की तुलना में 28.4 फीसदी बढ़ गया है. यह ट्रेंड साफ संकेत देता है कि तमाम जोखिमों के बावजूद किसानों का भरोसा धान पर कायम है.

विशेषज्ञों ने अल नीनो बनने से पहले आशंका जताई थी कि देश में धान की खेती, खासकर बासमती, प्रभावित हो सकती है. लेकिन शुरुआती रुझान इस अनुमान के उलट दिखाई दे रहे हैं. धान की बुवाई में तेजी ऐसे समय में आई है, जब कपास, गन्ना, दलहन और तिलहन जैसी फसलों के रकबे में गिरावट देखने को मिल रही है. हालांकि विशेषज्ञ इसे अभी अंतिम निष्कर्ष मानने से बच रहे हैं और इसे सीजन के शुरुआती चरण का प्रभाव बता रहे हैं.

क्या हैं बड़े कारण?

दरअसल, किसानों के इस रुझान के पीछे कई ठोस आर्थिक और व्यावहारिक कारण हैं. सबसे बड़ा कारण है धान की सरकारी खरीद की पक्की व्यवस्था. एमएसपी पर खरीद की गारंटी किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से काफी हद तक बचा लेती है. इसके उलट कपास और गन्ने जैसी फसलें कीमतों के मामले में बाजार और मांग पर ज्यादा निर्भर रहती हैं, जहां अचानक गिरावट किसानों को भारी नुकसान में डाल सकती है. अल नीनो के दौरान महंगाई और आपूर्ति में गड़बड़ी की संभावना के चलते यह जोखिम और बढ़ जाता है.

इसके अलावा, किसानों का मानना है कि खराब मॉनसून के बीच भी धान की पैदावार कई बार अपेक्षाकृत स्थिर रह सकती है, जबकि कपास जैसी फसलें अनियमित बारिश के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं. कपास में कीटों का खतरा भी बड़ा मुद्दा है. बारिश के पैटर्न में बदलाव होने पर बॉलवर्म जैसे कीट सक्रिय हो जाते हैं, जिससे पूरी फसल बर्बाद हो सकती है.

गन्ने के मामले में समस्या और भी जटिल है. यह लंबी अवधि की फसल है, जिसमें पूंजी लंबे समय तक फंसी रहती है और पानी की निरंतर उपलब्धता जरूरी होती है. ऐसे में अगर अल नीनो के कारण बांधों में पानी का स्तर गिरता है या सिंचाई प्रभावित होती है, तो गन्ना किसानों के लिए भारी घाटे का सौदा साबित हो सकता है. यही वजह है कि कई किसान इस बार गन्ने से दूरी बना रहे हैं.

सतर्कता बरतने की सलाह

हालांकि इस बदलते रुझान के बावजूद कृषि विशेषज्ञ सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं. पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख धान उत्पादक राज्यों पर अल नीनो का असर अलग-अलग स्तर पर पड़ सकता है. पंजाब और हरियाणा में नहर और ट्यूबवेल की सुविधा होने के बावजूद भूजल स्तर में गिरावट और बिजली संकट चिंता का विषय बन सकता है. वहीं उत्तर प्रदेश, जहां धान की खेती का बड़ा हिस्सा मॉनसून पर निर्भर है, वहां हालात ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि धान की बुवाई में मौजूदा तेजी कहीं न कहीं शुरुआती जल्दबाजी का नतीजा भी हो सकती है. अभी खरीफ सीजन अपने शुरुआती चरण में है और आने वाले हफ्तों में मॉनसून की स्थिति के अनुसार बुवाई के आंकड़ों में बड़े बदलाव संभव हैं. अगर अल नीनो और मजबूत होता है और बारिश सामान्य से कम रहती है, तो धान जैसी पानी पर निर्भर फसल सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती है.

इस स्थिति में किसानों का मौजूदा फैसला आगे चलकर फायदे का सौदा साबित होगा या नुकसान का कारण बनेगा, यह पूरी तरह मॉनसून की चाल पर निर्भर करेगा. फिलहाल इतना जरूर साफ है कि जोखिम के बावजूद किसान धान को सबसे सुरक्षित विकल्प मानकर आगे बढ़ रहे हैं और आने वाले दिनों में कृषि क्षेत्र की दिशा तय करने में मौसम की भूमिका निर्णायक रहने वाली है.

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