
भारत खेती-किसानी और विविधताओं से भरा देश है. यहां अलग-अलग फसलें अपनी खास पहचान की वजह से जानी जाती हैं. वहीं, कई फसलें अपने अनोखे नाम के लिए तो कई अपने स्वाद के लिए मशहूर होती हैं. ऐसी ही एक फसल है जिसकी वैरायटी का नाम पूसा रेशमी है. दरअसल, ये मूली की एक खास वैरायटी है, जिसकी खेती रबी सीजन में की जाती है. वहीं, बात करें मूली की तो इसकी खेती कंद सब्जी के रूप में की जाती है. मूली की खेती किसानों के लिए काफी लोकप्रिय खेती है. ऐसे में आइए जानते हैं मूली की कौन-कौन सी उन्नत किस्में हैं और कैसे करते हैं खेती?
पूसा रेशमी:- ये मूली की एक खास किस्म है. इस किस्म की जड़ें 30 से 35 सेंटीमीटर लंबी होती है. यह समान रूप से चिकनी और हल्की तीखी होती है. यह किस्म बुवाई से करीब 55 से 60 दिनों में तैयार हो जाती है. इस किस्म से करीब 315 से लेकर 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार ली जा सकती है.
पूसा हिमानी:- नवंबर के महीने में खेती के लिए ये किस्म बेस्ट है. इस किस्म का स्वाद हल्का तीखा होता है, लेकिन ये किस्म खाने में स्वादिष्ट होती है. ये किस्म बुवाई के 50 से 60 दिन में तैयार हो जाती है. मूली इस किस्म की औसत पैदावार 320 से 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है.
जापानी सफेद:- मूली की इस किस्म की जड़ें सफेद होती हैं. ये किस्म बेलनाकर, कम तीखी, मुलायम और चिकनी होती है. यह किस्म बुवाई से 45 से 55 दिन में तैयार हो जाती है. इस किस्म से 250 से लेकर 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.
रैपिड रेड व्हाइट टिपड:- मूली की इस किस्म का छिलका लाल रंग का होता है. इसकी जड़ें छोटे आकार की होती हैं. इनका गूदा सफेद रंग का होता है. ये स्वाद में थोड़ी मीठी होती है. इस किस्म की मूली बुवाई के करीब 25 से 30 दिन में तैयार हो जाती है.
पंजाब पसंद:- यह मूली की जल्दी तैयार होने वाली किस्म है. इस किस्म की खास बात यह है कि इसकी बुवाई किसी भी मौसम में की जा सकती है. इसकी जड़ें लंबी, रंग सफेद होती है. ये बुवाई के 45 दिन बाद तैयार हो जाती है.
मूली की खेती के लिए ठंडी जलवायु अच्छी मानी जाती है. मूली की बुवाई से पहले खेत को तैयार कर लेना चाहिए. खेत की पांच से छह बार जुताई कर लेनी चाहिए. मूली की फसल के लिए गहरी जुताई की आवश्यकता होती है क्योंकि इसकी जड़ें भूमि में अंदर तक जाती हैं. गहरी जुताई के लिए ट्रैक्टर या मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए. उसके बाद मूली के बीजों को तीन से चार सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए ताकि बीजों का जमाव ठीक से हो सके.