
बिहार में महिलाओं की कहानी अब सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही. मुख्यमंत्री महिला उद्यमी योजना के जरिए हजारों महिलाएं अपना काम शुरू कर रही हैं और दूसरों को भी रोजगार दे रही हैं. उद्योग विभाग के अनुसार, अब तक 9,100 से अधिक महिलाओं ने अपना व्यवसाय खड़ा किया है और सरकार की ओर से 671 करोड़ रुपये से अधिक का लाभ दिया जा चुका है. एक समय जहां घर का खर्च चलाना भी मुश्किल था. वहीं, आज कई महिलाएं अपने गांव में इकाई चला रही हैं.
पहले महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलकर काम करना ही बड़ी बात माना जाता था. लेकिन अब राज्य की महिलाएं खुद का कारोबार शुरू करने का हौसला दिखा रही हैं. योजना के तहत नई इकाई शुरू करने के लिए परियोजना लागत का 50 प्रतिशत, अधिकतम 5 लाख रुपये तक ब्याज मुक्त लोन दिया जाता है. इसके अलावा 50 प्रतिशत, अधिकतम 5 लाख रुपये तक विशेष प्रोत्साहन अनुदान भी मिलता है. महिलाओं को आर्थिक मदद के साथ ट्रेनिंग और जरूरी मार्गदर्शन भी दिया जाता है. इससे उन्हें अपना काम शुरू करने और आगे बढ़ने में मदद मिल रही है. कम संसाधनों के बावजूद महिलाएं मेहनत से अपना कारोबार खड़ा कर रही हैं. अब स्वरोजगार कई परिवारों की नई पहचान बन रहा है.
गया जिले के झिकटिया गांव की पल्लवी प्रियदर्शिनी डिस्पोजेबल डायपर और सेनेटरी नैपकिन बनाने का काम करती हैं. उनका कहना है कि योजना से मिली आर्थिक मदद, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन के बिना इस काम को आगे बढ़ाना मुश्किल होता. शुरुआत में उनके पास साधन कम थे और कई सामाजिक परेशानियां भी आईं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी. योजना के तहत उन्हें 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद मिली. आज उनकी इकाई से सालाना करीब 30 लाख रुपये की कमाई हो रही है. उनकी इकाई में गांव की कई महिलाएं भी काम करती हैं और अपने परिवार की आर्थिक मदद कर रही हैं.
पल्लवी ने अपनी इकाई में महिलाओं को प्रशिक्षण देना भी शुरू किया है. इससे गांव की महिलाओं को काम के साथ नया हुनर सीखने का मौका मिल रहा है. उनके बनाए उत्पाद कम कीमत और अच्छी क्वालिटी के कारण बाजार में पसंद किए जा रहे हैं. इस काम से पल्लवी की आमदनी बढ़ी है और गांव की कई महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होने का मौका भी मिला है. पल्लवी की कहानी गया ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य की उन महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई है, जो अपना कारोबार शुरू करना चाहती हैं.
अरवल जिले के रामचंद्र बिगहा गांव की आरती कुमार की कहानी भी ऐसी ही है. उनके पति योगेंद्र चौधरी दूसरे राज्यों में मजदूरी करते थे और घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी. योजना में आवेदन के बाद दस लाख रुपये मिले. आरती ने दुर्गा सिलाई सेंटर शुरू किया और छोटे बच्चों के रेडीमेड कपड़े बनाने लगीं. अब महीने में करीब 20 हजार रुपये की कमाई हो जाती है. यह काम वे और उनके पति मिलकर चलाते हैं. पति को अब मजदूरी के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती.
आरती कहती हैं कि योजना मिलने के बाद घर का माहौल बदल गया. पहले दयनीय स्थिति थी, अब काम से सम्मान और स्थिर आय दोनों मिले हैं. स्थानीय बाजार में उनके कपड़े बिक रहे हैं. ऐसी कहानियां बताती हैं कि सही मदद और थोड़ा हौसला मिल जाए तो महिलाएं न सिर्फ अपना घर चला सकती हैं, बल्कि दूसरों को भी काम दे सकती हैं. सरकार का दावा है कि यह योजना महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर रही है.