
समय के साथ जहां खेती में काफी बदलाव हुए हैं, वहीं दूसरी ओर अधिक उत्पादन की चाह में लोग रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं. इसका नतीजा है कि खेतों की उर्वरता खत्म हो रही है और जमीन बंजर हो रही है. हालांकि, वैज्ञानिकों की ओर से खेतों की उर्वरता को फिर से बहाल करने के लिए किसानों को प्राकृतिक खेती करने की सलाह दी जा रही है, जिसे राज्य के किसान अपना भी रहे हैं. कुछ ऐसा ही बांका जिले के लीलावरण गांव में देखने को मिला, जहां पुरुष किसान नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्र की 125 महिला किसानों ने प्राकृतिक खेती करके बंजर जमीन को उपजाऊ बना दिया है.
बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने की कहानी लीलावरण गांव की है, जहां कुछ वर्ष पहले 50 हेक्टेयर जमीन बेकार पड़ी थी. उस बेकार पड़ी परती जमीन पर कोई खेती नहीं करना चाहता था. लेकिन गांव की 125 महिलाओं ने उस भूमि पर खेती करने का निर्णय लिया. उनके इस निर्णय को प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना का साथ मिला.
सरकारी मदद से परती और उपेक्षित पड़ी जमीन को प्राकृतिक खेती के सफल मॉडल में बदल दिया गया. आज यह पहल खेती की नई संभावनाओं को साकार करने और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक प्रेरक मिसाल पेश कर रही है.
लीलावरण गांव के ग्रामीणों के अनुसार, 50 हेक्टेयर बेकार पड़ी जमीन पर खेती करने का निर्णय मिट्टी की जांच और सॉइल हेल्थ कार्ड के आधार पर लिया गया, ताकि किसान अपने खेत की वास्तविक स्थिति को समझ सकें. इसके बाद कृषि विज्ञान केंद्र के मार्गदर्शन में किसानों को जीवामृत, ब्रह्मास्त्र और नीमास्त्र जैसे रसायन-मुक्त इनपुट के इस्तेमाल का प्रशिक्षण दिया गया.
वहीं, जब इस मिट्टी में मूंगफली, सरसों, टमाटर, आलू और शिमला मिर्च जैसी फसलों की अच्छी पैदावार हुई, तो प्राकृतिक खेती की संभावनाएं सामने आईं और मिट्टी की सेहत सुधारने की दिशा में इस पहल का महत्व भी स्पष्ट हुआ.
आज बांका जिले के लीलावरण गांव की 125 महिलाओं ने न केवल प्राकृतिक खेती के जरिए परती जमीन को उपजाऊ बनाया, बल्कि गांव के अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती करने के लिए प्रेरित किया है. समय के साथ जिस तरह रासायनिक दवाओं और उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता खत्म हो रही है, उससे इंसानों में भी बीमारियों का खतरा बढ़ने की आशंका जताई जाती है.
प्राकृतिक खेती से जहां मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद मिल रही है, वहीं खेती की लागत कम करने का रास्ता भी खुल रहा है. यह पहल महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में एक प्रेरक मिसाल है.