
भारत के सेब बाजार पर लंबे समय से जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश का दबदबा रहा है, लेकिन अब दक्षिण भारत से एक नया चैलेंजर सामने आता दिख रहा है. दरअसल, आंध्र प्रदेश का नाम अब सेब उत्पादन को लेकर चर्चा में है, जिसने सबको चौंका दिया है. सूखे के लिए मशहूर अनंतपुर जिले में एक मेहनती किसान ने ठंडे इलाकों में उगने वाले सेब की सफल खेती कर नई उम्मीद जगा दी है. इस अनोखी सफलता ने न सिर्फ किसानों का ध्यान खींचा है, बल्कि राज्य सरकार भी अब इसे बड़े स्तर पर बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रही है.
सबसे दिलचस्प बात यह है कि KLD सेब की किस्म वहां की स्थानीय जलवायु में अच्छी तरह ढल गई है. इतना ही नहीं, इस सेब को बाजार में उत्तरी राज्यों के पारंपरिक सेबों से ज्यादा कीमत भी मिल रही है. यानी आने वाले समय में आंध्र प्रदेश भारत के सेब बाजार में बड़ा नाम बन सकता है.
रायलसीमा क्षेत्र के गरलदिन्ने मंडल के कोटंका गांव के किसान केवी रमना रेड्डी ने 2.5 एकड़ जमीन पर सेब की खेती कर नई मिसाल पेश की है. उन्होंने इजराइल से करीब 280 रुपये प्रति पौधा की दर से सेब के पौधे मंगवाए. इसके लिए 1,500 पौधों पर लगभग 4.2 लाख रुपये खर्च किए. किसान ने पौधों को 12x6 फीट दूरी पर लगाया और आधुनिक तरीके से खेती की. मेहनत का नतीजा यह रहा कि पहली ही फसल में उन्हें करीब एक टन सेब का उत्पादन मिला.
एक सरकारी सूत्र ने PTI को बताया कि अनंतपुर जिले के कुछ खास इलाकों में सेब की खेती नई बागवानी फसल के रूप में सामने आई है. शुरुआती नतीजे उत्साहजनक हैं. यहां उगाए गए सेब अच्छे आकार और स्वाद वाले हैं. बाजार में इनकी कीमत 120 से 170 रुपये प्रति किलो तक मिल रही है. यह दाम हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे पारंपरिक सेब उत्पादक राज्यों में किसानों को मिलने वाली सामान्य कीमतों से काफी ज्यादा है.
अनंतपुर जिले के गारलादिन्ना, कुंडुरपी और पेद्दापप्पूर मंडलों में अब 15 एकड़ जमीन पर सेब की खेती की जा रही है. खास बात यह है कि ये इलाके पहले सूखे और कम बारिश के लिए जाने जाते थे, लेकिन अब यहां सेब की खेती नई उम्मीद बनकर उभर रही है. किसान रेड्डी के बाग में मध्यम आकार के स्वादिष्ट सेब पैदा हुए, जिन्हें बाजार में अच्छी कीमत मिली. टॉप ग्रेड सेब 170 रुपये प्रति किलो और मध्यम ग्रेड सेब 120 रुपये प्रति किलो बिके.
जानकारों के मुताबिक, अनंतपुर में उगाए गए सेबों को बाजार में हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के सेबों से ज्यादा दाम मिले. जहां आंध्र प्रदेश के सेब 170 रुपये प्रति किलो तक बिके, वहीं उत्तरी राज्यों के सेबों की कीमत आमतौर पर 50 से 100 रुपये प्रति किलो के बीच रही.
रायलसीमा में उगाई जा रही सेब की इस किस्म का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह ऑफ-सीजन में तैयार होती है. यानी जब बाजार में दूसरे इलाकों के सेब कम होते हैं, तब यह बिकती है, इसलिए किसानों को ज्यादा दाम मिलते हैं. इसके अलावा इस किस्म में जल्दी फल भी आने लगते हैं. वहीं, हिमाचल प्रदेश के सेब किसानों के पास पहले से मजबूत सप्लाई चेन और बड़ा बाजार नेटवर्क है. कश्मीर की पारंपरिक सेब किस्मों की पहचान अच्छी पैदावार, बड़े स्तर पर उत्पादन और मजबूत ब्रांड वैल्यू के लिए होती है. वहां हाई-डेंसिटी बागानों में बहुत ज्यादा उत्पादन होता है.
इसके बावजूद अनंतपुर में सेब की खेती को एक बड़ी संभावना माना जा रहा है. इसकी वजह है कि यहां किसानों को ऑफ-सीजन में ज्यादा कीमत मिल सकती है, जल्दी फल मिलने से कम समय में कमाई हो सकती है, नई खेती मॉडल अपनाए जा सकते हैं और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है. सूत्रों के मुताबिक, अनंतपुर में सेब की खेती अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन इसमें काफी संभावनाएं नजर आ रही हैं. उत्तरी भारत के सेब सितंबर से नवंबर के बीच बाजार में आते हैं, जबकि अनंतपुर के सेब अलग समय पर तैयार होते हैं. यहां दिसंबर में फूल आते हैं और कटाई का समय भी अलग है. अगर उत्पादन और क्वालिटी अच्छी रही, तो किसानों को अच्छे दाम मिल सकते हैं.
सबसे बड़ी खासियत यह है कि हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में सेब के पेड़ों पर फल आने में 7 से 8 साल लगते हैं, जबकि अनंतपुर में उगाई जा रही KLD किस्म में दूसरे साल से ही फल आने लगते हैं. इससे किसानों की लागत जल्दी निकल सकती है और शुरुआती नुकसान का खतरा कम होता है. अनंतपुर में सेमी-हाई-डेंसिटी मॉडल अपनाया जा रहा है, जिसमें एक हेक्टेयर में करीब 3,700 पौधे लगाए जा सकते हैं. इसके मुकाबले हिमाचल और कश्मीर के पारंपरिक बागों में करीब 250 पेड़ ही लगाए जाते हैं. इससे यहां ज्यादा उत्पादन की उम्मीद है.
अगर तीसरे से पांचवें साल तक प्रति एकड़ 3 से 5 टन पैदावार मिलने लगे, तो 140 रुपये प्रति किलो के हिसाब से किसानों की आय 4.2 लाख से 7 लाख रुपये प्रति एकड़ तक हो सकती है. यह मूंगफली जैसी फसलों से होने वाली कमाई से कई गुना ज्यादा है. हालांकि कुछ चुनौतियां भी हैं. अनंतपुर सूखा प्रभावित इलाका है और सेब की खेती में पानी की जरूरत ज्यादा होती है, इसलिए ड्रिप सिंचाई जरूरी मानी जा रही है. इसके अलावा माइट्स जैसे कीटों का खतरा भी बढ़ सकता है.
सेब में पर-परागण की जरूरत होती है, इसलिए मधुमक्खियों के छत्तों का सही प्रबंधन जरूरी होगा. अगर खेती का क्षेत्र तेजी से बढ़ा, तो बाजार में अभी मिल रही ऊंची कीमतें भी कम हो सकती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को सेब की खेती की तकनीक सिखाने, पानी की व्यवस्था करने, कीट नियंत्रण और परागण की सुविधाएं बढ़ाने की जरूरत है. राज्य सरकार को पहले इस पर विस्तृत अध्ययन करना चाहिए, प्रदर्शन खेत तैयार करने चाहिए और कम से कम 2 से 3 फसल चक्रों के भरोसेमंद नतीजे आने के बाद ही बड़े स्तर पर खेती बढ़ानी चाहिए.