
रबी सीजन में बोई जाने वाली फसलों पर कीटों का खतरा हमेशा बना रहता है. खासकर माहू कीट का खतरा. जिस वजह से किसानों के मन में फसल नुकसान का डर रहता है. वहीं गेहूं की फसल में पीला रतुआ और झुलसा रोग का खतरा भी रहता है. गेहूं भारत की महत्वपूर्ण प्रमुख फसलों में से एक है जिसकी खेती रबी मौसम में की जाती है. भारत में प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और बिहार शामिल हैं.गेहूं में पीला रतुआ जिसे धारीदार रतुआ भी कहा जाता है, भारत में एक गंभीर बीमारी है, जो गेहूं उगाने वाले किसानों के लिए खतरा है.
पीला रतुआ लगभग 50% उपज हानि का कारण बन सकता है, लेकिन गंभीर परिस्थितियों में, यह 100% उपज हानि का कारण बन सकता है. यह रोग उपज और अनाज की गुणवत्ता को कम कर सकता है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान हो सकता है. ऐसे में सोंठास्त्र छिड़काव कर इसे रोका जा सकता है. क्या है ये तरीका आइए जानते हैं.
पीला या धारीदार रतुआ पुकिनिया स्ट्राइफोर्मिस कवक के कारण होता है. यह सर्दियों या शुरुआती वसंत महीनों के दौरान गेहूं की एक प्रचलित बीमारी है. यह रोग गेहूं की वृद्धि की सभी अवस्थाओं को संक्रमित कर सकता है, लेकिन पौधे की वृद्धि की प्रारंभिक अवस्था में सबसे अधिक हानिकारक होता है. ठंडे और नम मौसम की स्थिति, लगभग 10-15 डिग्री सेल्सियस का तापमान, उच्च आर्द्रता और रुक-रुक कर होने वाली वर्षा या ओस रोग के विकास में सहायक होती है. यह रोग हवा में फैलता है जिसके कारण यह रोग एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलता है. कई वर्षों तक एक ही प्रकार की गेहूं की किस्में उगाने से रोग की गंभीरता बढ़ सकती है.
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सोंठास्त्र विधि के तहत लगभग 7-8 दिन पुरानी खट्टी लस्सी (1.5 लीटर) को 40 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें. साथ ही आठ दिन के बाद फिर से छिड़काव करें. 600 मिलीलीटर लस्सी और बचा हुआ पानी एक पंप में मिलाकर स्प्रे करें. सोंठास्त्र (1.5 लीटर) को 40 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें. 50 ग्राम सूखी सोंठ को पीसकर चूर्ण बना लें. फिर इसे 500 मिलीलीटर पानी में उबालें और आधा रह जाने पर इसे ठंडा कर लें. इसके बाद एक बर्तन में 500 मिलीलीटर देशी गाय का दूध उबालें, ठंडा करें और दूध की मलाई अलग कर लें. दूध और सोंठ को पानी मिला लें. इसे बनाने के 48 घंटे बाद सोंठास्त्र का प्रयोग करें.
7-8 दिन पुरानी लस्सी (600 मिली), एक लीटर जीवामृत और बचा हुआ पानी स्प्रे पंप में डालकर आठ दिन के अंतराल पर छिड़काव करें. 40 लीटर पानी, 2 किलोग्राम देसी गाय का गोबर, 2 लीटर देसी गाय का मूत्र, 200 ग्राम गुड़, 200 ग्राम बेसन, एक मुट्ठी खेत या धान की मिट्टी (रसायन रहित) मिलाकर एक ड्रम में घोल लें. घोल को घड़ी की दिशा में 2-3 मिनट तक हिलाएं. ड्रम को बोरी से ढककर 72 घंटे तक छाया में रखें और प्रतिदिन सुबह-शाम दो-तीन मिनट तक मिलाते रहें. इसके बाद सात दिन के अंदर जीवामृत का सेवन करें. इससे फसल को बीमारियों से बचाया जा सकता है.