
खेती-किसानी में मिट्टी और पानी सबसे अहम किरदार निभाते हैं. लेकिन, इन दिनों दोनों खतरे में हैं. पानी पाताल में जा रहा है और मिट्टी खराब हो रही है. आज विश्व मृदा दिवस (World Soil Day) है. इसलिए हम बात करेंगे मिट्टी. जिसके बिगड़ते स्वास्थ्य को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक कई बार बातचीत कर चुके हैं. मिट्टी से ऑर्गेनिक कार्बन लगातार घट रहा है. भविष्य में यह किसानों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है. क्योंकि इसके घटने से खेत में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है. जिससे उत्पादन कम होने लगता है. उसे पूरा करने के लिए किसान रासायनिक उर्वरकों का और इस्तेमाल करते हैं जिससे खेती का खर्च बढ़ता है. यही नहीं स्वायल ऑर्गेनिक कार्बन (SOC) और घट जाता है.
पूसा इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली में माइक्रो बायोलॉजी के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. युद्धवीर सिंह कहते हैं कि पहले इंडो-गंगेटिक प्लेन में औसत आर्गेनिक कार्बन 0.5 फीसदी हुआ करता था, जो रासायनिक उर्वरकों के साइड इफेक्ट से अब घटकर कुछ स्थानों पर तो सिर्फ 0.2 फीसदी रह गया है. दूसरे कई वैज्ञानिकों ने भी समय-समय पर यह कहा है कि देश में एसओसी की मात्रा घटकर 0.3-0.4 प्रतिशत रह गई है, जो यह स्वीकार्य सीमा से काफी नीचे है. यह स्थिति खेती के लिए नई चुनौती है.
डॉ. सिंह कहते हैं कि स्वायल ऑर्गेनिक कार्बन सारे पोषक तत्वों का सोर्स होता है. इसकी कमी से पौधे का विकास रुक जाता है. उनमें रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है. ऑर्गेनिक कार्बन मिट्टी को इसकी जल-धारण क्षमता, संरचना और उर्वरता प्रदान करता है. ओएससी सामग्री में इतनी भारी गिरावट मिट्टी की उत्पादकता को प्रभावित करती है क्योंकि सूक्ष्म जीव जीवित नहीं रहते हैं, जो पौधों के लिए पोषक तत्व प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण कारक हैं.
अब वक्त सिंथेटिक उर्वरकों के बजाय जैव उर्वरकों को बढ़ावा देने का है. रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने ऑर्गेनिक फर्टिलाईजर का इस्तेमाल बढ़ाना होगा. तब जाकर ऑर्गेनिक कार्बन में वृद्धि होगी. इसके लिए धीरे-धीरे हमें जैविक और प्राकृतिक खेती की ओर रुख करना होगा.
स्वायल ऑर्गेनिक कार्बन जहां 1 से 1.5 फीसदी हो वो बहुत उपजाऊ जमीन होती है. पिछले सात-आठ दशक में इसकी मात्रा 1 प्रतिशत से घटकर 0.3 प्रतिशत रह गई है, जो कृषि क्षेत्र के लिए चिंता का विषय है. बढ़ते वायुमंडलीय तापमान, खराब फसल प्रबंधन, रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग और मिट्टी के कटाव के कारण यह तेजी से नीचे आ रहा है.
गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत का दावा है कि सिंथेटिक फर्टिलाईजर व कीटनाशक का इस्तेमाल करने वाले किसानों के खेतों में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर 0.3 से 0.4 से अधिक नहीं है, जबकि कुरुक्षेत्र स्थित उनके गुरुकुल में यह स्तर 0.8 फीसदी से ऊपर है. क्योंकि यहां प्राकृतिक खेती होती है.
फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) ने फर्टिलाईजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के हवाले से लिखा है कि 1969-70 में
भारत में रासायनिक उर्वरकों की खपत का प्रति हेक्टेयर सिर्फ 11.04 किलो थी. उधर, आरबीआई की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2004-05 के दौरान देश में प्रति हेक्टेयर 94.5 किलो उर्वरक (NPK-नाइट्रोजन-N, फास्फोरस-P, पोटेशियम-K) खपत थी. यह 2018-19 में 133 किलोग्राम हो गई है.
उर्वरक प्रयोग के संबंध में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा पांच दशक के दौरान कुछ तय स्थानों पर की गई अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना से संकेत मिला है कि अकेले नाइट्रोजन उर्वरक यानी यूरिया के निरंतर प्रयोग से मिट्टी के स्वास्थ्य और फसल उत्पादकता पर हानिकारक प्रभाव पड़ा है. इससे पता चलता है कि मिट्टी में दूसरे प्रमुख और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है. पोषक तत्वों की कमी भी पौधे की वृद्धि को प्रभावित करती है.
जब हमें अंग्रेजों से आजादी मिली तब यानी 1947 में देश की जनसंख्या महज 37.6 करोड़ थी. इसके बावजूद हम अनाज के मामले में आत्मनिर्भर नहीं थे. हम खाद्यान्न संकट का सामना कर रहे थे. साल 1965 में भी भारत के लोग अमेरिका की पीएल-480 स्कीम के तहत मिले लाल गेहूं को खाने के लिए मजबूर थे. ऐसे में देश को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए हरित क्रांति (1965-66) शुरू हुई.
बौनी किस्मों के गेहूं और धान के बीज आए. जिनका उत्पादन अधिक था लेकिन खाद और पानी की जरूरत थी. यहीं से रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ने लगा. लेकिन कुछ साल बाद उत्पादन बढ़ाने के लिए इसका अंधाधुंध इस्तेमाल किया जाने लगा. यानी संतुलित इस्तेमाल न होने की वजह से आज मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा इतने नीचे पहुंच गई है कि उस पर बंजर होने का खतरा मंडराने लगा है.
केंद्र सरकार की ओर से बनाई गई क्रॉप डायवर्सिफिकेशन कमेटी के सदस्य बिनोद आनंद का कहना है कि मिट्टी की सेहत ठीक रखनी है तो फसल विविधीकरण की ओर जाना होगा. एक जगह पर लगातार एक ही फसल को लेना बंद करना होगा. ऐसी फसलों को लेना है तो वातावरण से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में फिक्स करने का काम करती हैं. साथ ही जैविक और प्राकृतिक खेती की ओर रुख करना होगा.