खाद सप्लाई को लेकर अलर्ट मोड में सरकार और उद्योग (सांकेतिक तस्वीर)पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने अब खाद बाजार की धड़कनें तेज कर दी हैं. समुद्री रास्तों में रुकावट और ऊर्जा की कीमतों में उछाल ने उर्वरक उत्पादन से लेकर सप्लाई तक पूरी व्यवस्था पर दबाव बना दिया है. हालात ऐसे बन रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल का असर धीरे-धीरे घरेलू स्तर तक महसूस होने लगा है. फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी ने साफ कहा कि पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति ने वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है.
उन्होंने कहा कि यह इलाका प्राकृतिक गैस और जरूरी पोषक तत्वों की सप्लाई का बड़ा केंद्र है. ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री रास्तों पर बाधाएं और एलएनजी की कमी ने लागत और आपूर्ति दोनों को प्रभावित किया है. करीब एक महीने से जारी अंतरराष्ट्रीय टकराव के कारण कच्चे तेल से लेकर खाद तक की सप्लाई चेन प्रभावित हुई है.
इसका असर अब बाजार में दिखने लगा है, जहां कुछ जगहों पर कीमतों में तेजी और उपलब्धता को लेकर दबाव के संकेत सामने आ रहे हैं. हालांकि, भारत ने इस चुनौती को हल्के में नहीं लिया है. सरकार और उद्योग के बीच लगातार समन्वय बनाए रखा गया है और हाल ही में बनाए गए सशक्त समूह हालात की निगरानी में जुटे हैं. सप्लाई को सुचारु रखने और किसी भी जोखिम को समय रहते संभालने के लिए लगातार समीक्षा की जा रही है.
भारत भले ही दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खाद उपभोक्ता और तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. एलएनजी महंगा होने से यूरिया उत्पादन की लागत सीधे बढ़ती है, जबकि लॉजिस्टिक अड़चनें समय पर सप्लाई को प्रभावित कर सकती हैं. ऐसे में हर उतार-चढ़ाव का असर किसानों तक पहुंचने का खतरा बना रहता है.
उद्योग भी मोर्चा संभाले हुए है और यूरिया उत्पादन को बनाए रखने के लिए गैस आवंटन और प्लांट संचालन को संतुलित किया जा रहा है, ताकि उत्पादन पर असर न पड़े. वहीं फॉस्फेटिक खाद के लिए अलग-अलग देशों से खरीद और दीर्घकालिक समझौतों के जरिए जोखिम को कम करने की कोशिशें तेज की गई हैं.
सरकार की नीतिगत पहल, घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी और उद्योग के साथ बेहतर तालमेल ने इस सेक्टर को पहले से ज्यादा मजबूत जरूर बनाया है, लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है. फिलहाल खाद की उपलब्धता को संतोषजनक बताया जा रहा है और फोकस किसानों तक बिना रुकावट सप्लाई पहुंचाने पर है.
उधर, एक हालिया रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है. इसमें कहा गया है कि सप्लाई चेन में रुकावट बनी रही तो देश में यूरिया और जटिल खाद का उत्पादन 10 से 15 प्रतिशत तक घट सकता है. कच्चे माल की कमी से उत्पादन क्षमता प्रभावित होगी और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ेगा.
साथ ही आयातित खाद और कच्चे माल की बढ़ती कीमतें कंपनियों की कार्यशील पूंजी की जरूरत बढ़ाएंगी. इसका सीधा असर सरकार पर भी पड़ सकता है, जहां सब्सिडी का बोझ 20 हजार से 25 हजार करोड़ रुपये तक बढ़ने का अनुमान है. ऐसे में आने वाले दिनों में वैश्विक हालात और घरेलू संतुलन के बीच तालमेल बनाए रखना सबसे बड़ी परीक्षा होगी. (एएनआई)
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