
खरीफ सीजन की बुवाई से पहले भारत ने वैश्विक बाजार से बड़ी मात्रा में यूरिया खरीदने की तैयारी शुरू कर दी है. देश में उर्वरक की मांग बढ़ने और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण गैस सप्लाई प्रभावित होने से सरकार ने आयात पर जोर बढ़ाया है. सरकारी कंपनी नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड ने 17 लाख टन यूरिया खरीदने के लिए वैश्विक टेंडर जारी किया है. इसमें करीब 9 लाख टन यूरिया पश्चिमी तट के बंदरगाहों के जरिए आयात किया जाएगा, जबकि बाकी मात्रा पूर्वी तट के रास्ते से मंगाई जाएगी. ‘ब्लूमबर्ग’ के मुताबिक, टेंडर में सभी खेपें 20 जुलाई तक लोडिंग पोर्ट से रवाना होने की शर्त रखी गई है.
देश में जून से खरीफ फसलों की बुवाई शुरू होने वाली है. धान, मक्का और सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलों के लिए इस दौरान यूरिया की मांग तेजी से बढ़ जाती है. ऐसे में सरकार समय रहते पर्याप्त भंडारण सुनिश्चित करना चाहती है, ताकि किसानों को सीजन में उर्वरक की कमी का सामना न करना पड़े.
भारत में यूरिया उत्पादन काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है. यह गैस बड़े पैमाने पर पश्चिम एशिया से आयात की जाती है और अमोनिया उत्पादन में इस्तेमाल होती है, जो यूरिया बनाने का मुख्य कच्चा माल है. हाल के संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने से एलएनजी सप्लाई पर दबाव बढ़ा है. इसका असर दक्षिण एशिया के कई उर्वरक संयंत्रों पर भी पड़ा और कुछ इकाइयों को उत्पादन घटाना पड़ा.
पश्चिम एशिया से गुजरने वाली सप्लाई प्रभावित होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में तेजी आई है. दुनिया की बड़ी मात्रा में यूरिया सप्लाई फारस की खाड़ी के रास्ते होती है, इसलिए तनाव बढ़ने से बाजार में अनिश्चितता भी बढ़ गई है. भारत ने पिछले टेंडर में करीब 25 लाख टन यूरिया खरीदा था, जहां कीमतें संघर्ष शुरू होने से पहले के स्तर की तुलना में काफी ज्यादा रहीं.
उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, जून से सितंबर के बीच होने वाली खरीफ खेती के लिए देश को करीब 3.9 करोड़ टन उर्वरक की जरूरत होगी. फिलहाल देश में लगभग 2 करोड़ टन उर्वरक का भंडार मौजूद है. सरकार का फोकस समय पर आयात बढ़ाकर सप्लाई को स्थिर बनाए रखने पर है ताकि बुवाई सीजन के दौरान बाजार में दबाव न बढ़े.