Fertilizer Import: होर्मुज संकट के बीच भारत की नई तैयारी, खाद सप्लाई के लिए ऐसे बदलेगा समुद्री रास्ता

Fertilizer Import: होर्मुज संकट के बीच भारत की नई तैयारी, खाद सप्लाई के लिए ऐसे बदलेगा समुद्री रास्ता

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर अनिश्चितता के बीच भारत खाद सप्लाई के लिए वैकल्पिक समुद्री रास्तों पर काम कर रहा है. सऊदी के यनबू पोर्ट को लेकर चर्चा तेज है. पढ़ें रिपोर्ट...

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क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Jun 02, 2026,
  • Updated Jun 02, 2026, 12:35 PM IST

भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादक देशों में शामिल है और गेहूं-चावल उत्पादन में मजबूत स्थिति रखता है. लेकिन खेती की यह ताकत पूरी तरह घरेलू नहीं है. खेत भारत के हैं, फसल भारत की है, लेकिन मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने वाले कई जरूरी पोषक तत्व अब भी विदेशों से आते हैं. साल 2024 में भारत ने उर्वरक आयात पर करीब 7.68 अरब डॉलर खर्च किए. इससे भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उर्वरक आयातक बना. रूस सबसे बड़ा सप्लायर रहा और उसकी हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत रही, लेकिन अगर पूरे क्षेत्र को देखें तो पश्चिम एशिया का महत्व और बड़ा दिखता है. सऊदी अरब, ओमान, यूएई, कतर और बहरीन मिलकर भारत के कुल उर्वरक आयात में करीब 37 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं.

गैस और कच्चे माल पर भी निर्भरता

भारत सिर्फ तैयार उर्वरक नहीं खरीदता, बल्कि घरेलू उत्पादन के लिए जरूरी संसाधन भी बाहर से लाता है. यूरिया और अमोनिया उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस चाहिए, जबकि कई दूसरे उर्वरकों के लिए सल्फर जैसे कच्चे पदार्थ जरूरी होते हैं. यही वजह है कि पश्चिम एशिया भारत के लिए केवल तेल क्षेत्र नहीं बल्कि खेती से जुड़ा रणनीतिक क्षेत्र भी है. खाड़ी देशों की सस्ती गैस वहां उर्वरक उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाती है और भारत उस सप्लाई चेन से जुड़ा हुआ है.

होर्मुज संकट ने बढ़ाई चिंता

हाल के महीनों में अमेरिका, ईरान और क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य पर दबाव बढ़ा है. यह सि‍र्फ तेल के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिए अहम उर्वरक और LNG व्यापार का भी अहम समुद्री मार्ग है. दुनिया के करीब एक तिहाई उर्वरकों की आवाजाही सामान्य परिस्थितियों में इसी मार्ग से जुड़ी मानी जाती है.

तनाव बढ़ने के बाद जहाजों की गति धीमी हुई, बीमा लागत बढ़ी और अमोनिया, नाइट्रोजन और सल्फर की सप्लाई प्रभावित होने लगी. इसका असर वैश्विक बाजार में भी दिखा. रिपोर्टों के अनुसार, कतर की QAFCO इकाई, जिसे दुनिया के सबसे बड़े सिंगल साइट यूरिया निर्यात परिसरों में माना जाता है, संकट के दौरान प्रभावित हुई और कुछ ही हफ्तों में यूरिया कीमतों में 60 प्रतिशत से ज्यादा उछाल देखने को मिला.

भारत की किस रास्‍ते पर नजर?

भारत ने संभावित जोखिम को देखते हुए पहले से तैयारी शुरू कर दी है. 14 मार्च को भारत के सऊदी अरब स्थित दूतावास ने यनबू बंदरगाह को क्षेत्रीय व्यापार के लिए तेजी से उभरता केंद्र बताया था. इसके बाद भारतीय अधिकारियों ने वहां पोर्ट संचालन, सड़क कनेक्टिविटी और व्यापार क्षमता का आकलन किया. इसी साल भारत और सऊदी अरब के बीच शिपिंग और लॉजिस्टिक्स सहयोग को मजबूत करने के लिए संयुक्त कार्य समूह बनाने पर भी सहमति बनी.

संभावित वैकल्पिक मॉडल के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में फंसे या आने वाले उर्वरक कार्गो को पहले फारस की खाड़ी के बंदरगाहों तक लाया जा सकता है. वहां से लगभग 1200 किलोमीटर सड़क मार्ग के जरिए सऊदी अरब के भीतर यनबू बंदरगाह तक पहुंचाया जाए. इसके बाद कार्गो को रेड सी और अरब सागर के रास्ते भारतीय बंदरगाहों तक भेजा जाए. इस मॉडल का उद्देश्य सप्लाई को पूरी तरह होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर होने से बचाना है.

भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन पा रहा?

उर्वरक आयात को अक्सर केवल नीति की कमजोरी माना जाता है, लेकिन इसके पीछे भूगोल की भी बड़ी भूमिका है. भारत के पास फॉस्फेट और पोटाश के बड़े भंडार नहीं हैं. साथ ही बड़े स्तर पर सस्ती प्राकृतिक गैस उपलब्ध नहीं है. दूसरी तरफ कतर, सऊदी अरब और ओमान जैसे देशों के पास गैस संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं, जिससे वे कम लागत पर यूरिया और अमोनिया तैयार करते हैं.

सरकार के सामने खर्च की चुनौती

भारत के लिए फिलहाल तत्काल संकट की स्थिति नहीं दिखती. सरकार ने खरीफ सीजन के लिए यूरिया, डीएपी, एमओपी और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों के पर्याप्त भंडार होने की बात कही है. लेकिन अगर संकट लंबा चला तो सबसे बड़ा दबाव सब्सिडी पर पड़ सकता है. 

2024-25 में उर्वरक सब्सिडी का प्रावधान 1.68 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर करीब 1.92 लाख करोड़ रुपये तक करना पड़ा. वहीं खरीफ 2026 के लिए फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों पर अनुमानित सब्सिडी 41,534 करोड़ रुपये आंकी गई, जो पिछले सीजन से ज्यादा है. इस साल खरीफ सीजन के लिए भारत की कुल उर्वरक जरूरत 390 लाख मीट्रिक टन से अधिक आंकी गई है.

फिलहाल सरकार के पास पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, लेकिन अगर संकट लंबा खिंचता है तो सवाल केवल उर्वरक उपलब्धता का नहीं रहेगा, बल्कि यह होगा कि भारत बढ़ती वैश्विक कीमतों और सब्सिडी बोझ को कितने समय तक संभाल पाएगा. (विदिशा साह की रिपोर्ट)

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