
जिस धरती को हम 'मां' कहते हैं, आज वही रासायनिक उर्वरकों के 'ओवरडोज' से कराह रही है. अधिक पैदावार की अंधी दौड़ में किसानों ने खेतों को केवल नाइट्रोजन (यूरिया) का अभ्यस्त बना दिया है, जिससे फास्फोरस और पोटाश जैसे जीवनदायी तत्व हाशिए पर चले गए हैं. वैज्ञानिक मानकों के अनुसार, खेतों में उर्वरकों का आदर्श अनुपात 4 हिस्सा नाइट्रोजन (N), 2 हिस्सा फास्फोरस (P) और 1 हिस्सा पोटाश (P) होना चाहिए. लेकिन वर्तमान में देश में 4:2:1 का यह संतुलन बिगड़कर 9.3 : 3.5 : 1 के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. इसका सीधा अर्थ यह है कि किसान पोटाश के हर 1 किलो के मुकाबले 9 किलो से ज्यादा नाइट्रोजन का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि यह मात्रा केवल 4 किलो होनी चाहिए. यानी हम जरूरत से दोगुने से भी अधिक यूरिया मिट्टी में झोंक रहे हैं. इसी तरह, फास्फोरस का उपयोग भी पोटाश के मुकाबले साढ़े तीन गुना हो गया है, जबकि आदर्श रूप में यह मात्र 2 गुना होना चाहिए.
ऐसे में उर्वरक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान यूरिया का संतुलित उपयोग शुरू कर दें और NPK अनुपात 4:2:1 के स्तर पर आ जाए, तो भारत को 'तैयार यूरिया' आयात करने की कतई आवश्यकता नहीं पड़ेगी. हम न केवल मिट्टी का स्वास्थ्य बचा पाएंगे, बल्कि देश का कीमती विदेशी मुद्रा भंडार भी सुरक्षित कर सकेंगे. भारत में यूरिया का घरेलू उत्पादन लगभग 300 लाख मीट्रिक टन (LMT) है, जबकि कुल खपत 360 LMT के करीब बनी हुई है. इस मांग और आपूर्ति के बीच के बड़े अंतर को पाटने के लिए वर्ष 2023-24 में भारत ने 70.42 LMT यूरिया का आयात किया, जिस पर लगभग 21,600 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च हुई.
आज जब मध्य-पूर्व के देश युद्ध और भू-राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में है, तब भारत के लिए उर्वरक आपूर्ति, विशेषकर यूरिया का संकट एक गंभीर चुनौती बनकर उभर सकता है. ऐसे वैश्विक तनाव के बीच खाद के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता न केवल आर्थिक बोझ है, बल्कि हमारी 'खाद्य संप्रभुता' के लिए भी जोखिम है. उर्वरक क्षेत्र के विशेषज्ञ दिनेश पी. सिंह का मानना है कि वर्तमान में नाइट्रोजन (N) का उपयोग जरूरत से दोगुना से भी अधिक (9.3 के अनुपात में) हो रहा है. यदि किसान इस असंतुलन को सुधारकर आदर्श 4:2:1 के अनुपात को अपना लें, तो यूरिया की मांग में भारी गिरावट आएगी. इससे भारत न केवल यूरिया के मामले में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि युद्ध जैसी वैश्विक परिस्थितियों में भी हमारी कृषि व्यवस्था पर कोई खास आंच नहीं आएगी.
राजस्थान के खेतों में पोषक तत्वों का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है. यहां किसान पोटाश के मुकाबले 45 गुना ज्यादा यूरिया डाल रहे हैं, जबकि यह सिर्फ 4 गुना होना चाहिए. पोटाश का इस्तेमाल नाममात्र (सिर्फ 1 हिस्सा) रह गया है. इसके बिना न तो पौधों में बीमारियों से लड़ने की ताकत रहती है और न ही दानों में चमक आती है.
झारखंड के आंकड़े भी खेती के भविष्य के लिए खतरे की घंटी हैं. यहां पोटाश के हर 1 किलो के मुकाबले 37 किलो नाइट्रोजन डाला जा रहा है. यह आदर्श मात्रा से 9 गुना अधिक है. फास्फोरस का इस्तेमाल भी जरूरत से 5 गुना ज्यादा (आदर्श 2 के मुकाबले 11) हो रहा है. नतीजा यह है कि मिट्टी अपनी प्राकृतिक शक्ति खो रही है और फसलें कमजोर व गुणवत्ताहीन हो रही हैं. बाकी सूबों में भी इसी तरह के हालात हैं, जिसे आप ग्राफिक्स में देख सकते हैं.
उर्वरकों का यह असंतुलन खेतों में केवल 'दिखावे की हरियाली' और पराली का बोझ बढ़ा रहा है, जबकि हकीकत में हमारी जमीन अंदर से बंजर और जहरीली होती जा रही है. इस असंतुलन से न केवल खेती की लागत बढ़ रही है, बल्कि यह हमारे भूजल को नाइट्रेट से और हवा को नाइट्रस ऑक्साइड से प्रदूषित कर रहा है. नाइट्रस ऑक्साइड एक अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जो ग्लोबल वार्मिंग और ओजोन परत के क्षरण का एक प्रमुख कारण है. विडंबना यह है कि हम अनजाने में अपनी थाली में शुद्ध अनाज नहीं, बल्कि केमिकल का वह 'धीमा जहर' परोस रहे हैं, जिसकी कीमत आज की पीढ़ी खराब सेहत के रूप में चुका रही है.
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की 'एनुअल ग्राउंड वॉटर क्वालिटी रिपोर्ट 2024-25' के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि भारत के 440 जिलों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित सीमा (45 मिलीग्राम प्रति लीटर) को पार कर चुकी है. जब मिट्टी में यूरिया यानी नाइट्रोजन ज्यादा होता है, तो वह पौधों के जरिए हमारी थाली तक पहुंचता है. शरीर में जाकर यह नाइट्रेट 'नाइट्राइट' में बदल जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. लंबे समय तक नाइट्रेट युक्त भोजन और पानी का सेवन पेट और पाचन तंत्र के कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकता है.
यह स्पष्ट संकेत है कि खेती में यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल मिट्टी और मानव जीवन, दोनों के लिए 'साइलेंट किलर' साबित हो रहा है. कुल मिलाकर, भारतीय कृषि आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित उपयोग 'वरदान' से 'अभिशाप' में बदल चुका है.
फास्फोरस और पोटाश की इस अनदेखी ने जमीन की प्राकृतिक उर्वरता को सोखकर फसलों को बीमारियों का घर बना दिया है. आधुनिक खेती में संतुलित उर्वरक (NPK - नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश) मिट्टी की सेहत के लिए जरूरी है. हालांकि, किसान अक्सर तुरंत हरियाली और शुरुआती बढ़वार के लालच में फास्फोरस (P) और पोटाश (K) की अनदेखी कर यूरिया (नाइट्रोजन - N) का बहुत ज्यादा उपयोग कर रहे हैं.
स्वायल साइंस के विशेषज्ञ प्रो. संजय स्वामी का कहना है कि किसान अक्सर अधिक ज्यादा पैदावार की चाह में ऐसा करते हैं, लेकिन इसके परिणाम विपरीत होते हैं. यूरिया का यह असंतुलित इस्तेमाल मिट्टी की संरचना को बिगाड़ रहा है, जिससे खेत अम्लीय और कठोर हो रहे हैं. उसमें मौजूद केंचुए व सूक्ष्मजीव मर रहे हैं. फास्फोरस और पोटाश के बिना, पौधे की जड़ें कमजोर रह जाती हैं और उसमें रोगों से लड़ने की क्षमता खत्म हो जाती है. उपज चमकदार और अच्छी नहीं होती.
यही नहीं, ज्यादा यूरिया से पौधा बहुत गहरा हरा और रसीला हो जाता है, जो कीटों को अधिक आकर्षित करता है. मिट्टी अम्लीय होने से उसमें मौजूद कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे जरूरी तत्व खत्म होने लगते हैं, इससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति स्थायी रूप से कम हो जाती है और फसलें कमजोर पड़ने लगती हैं.
एग्रोनॉमी के प्रधान कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजीव कुमार सिंह यूरिया के मुताबिक बेतहाशा इस्तेमाल से खेत में बहुत जल्दी हरियाली आ जाती है. जिससे किसान को लगता है फसल अच्छी हो रही है, जबकि फास्फोरस और पोटाश के बिना पौधे की जड़ें कमजोर और रोग प्रतिरोधक क्षमता शून्य हो जाती है. जिससे पौधों में बीमारियां और कीट लगते हैं. फिर उनसे निपटने के लिए किसान कीटनाशकों के दुष्चक्र में उलझ जाता है. इससे उपज और जहरीली हो जाती है. जब आप यूरिया ज्यादा डालते हैं, तो पौधा जमीन से फास्फोरस और पोटाश को और तेजी से खींचता है. इससे मिट्टी में इन तत्वों की भारी कमी हो जाती है और जमीन धीरे-धीरे बंजर होने लगती है.
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