
खेतों में मेहनत करके अन्न पैदा करने वाले किसान आज भी खाद जैसी बुनियादी चीज के लिए न सिर्फ परेशान हैं बल्कि दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं. रासायनिक उर्वरकों के लिए वो लंबी-लंबी लाइनों में खड़े होने को मजबूर हैं. इस साल आपने खाद के लिए किसानों की रोती हुई और पुलिस की लाठियां खाती हुईं कई तस्वीरें और वीडियो देखी होंगी. लेकिन, उर्वरक मंत्रालय के अधिकारियों और उसके मंत्री को ये सब दिखाई नहीं पड़ रहा है. चिंतन शिविर आयोजित करके सरकार की ऐसी तारीफ की जा रही है जैसे खाद किसानों के घर-घर पहुंचाई गई हो. जमीनी हालात बता रहे हैं कि किसानों को खाद के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है और दिल्ली दरबार में मंत्रालय के लोग इसी व्यवस्था पर लहालोट हैं. खाद के लिए हुई मारामारी, किसानों की पिटाई और रोने वाली घटनाओं की लीपापोती करने की कोशिश जारी है.
बहरहाल, सरकारी लोग हैं तो सरकारी टाइप की ही बात करेंगे. उनसे किसानों को हुई परेशानी को स्वीकार करने की उम्मीद तो की नहीं जा सकती. तो कहानी ये है कि उर्वरक महकमे के मंत्री जेपी नड्डा ने दावा कर दिया है कि विकट परिस्थितियों के बावजूद पूरे देश में सफलतापूर्वक उर्वरक पहुंचाया गया है और उर्वरक विभाग का काम सराहनीय रहा है. सोचने वाली बात यह है कि खाद के लिए पुलिस के डंडे खाने वाले और रोने वाले किसान इस दावे पर कैसे यकीन कर लेंगे? फिर भी उर्वरक मंत्रालय के चिंतन शिविर में जो कुछ भी हुआ उसे भी बताना जरूरी है.
चिंतन शिविर में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि किसानों का जीवन आसान बनाना सरकार की प्राथमिकता है. लेकिन सवाल यह है कि अगर सच में जीवन आसान हुआ होता, तो किसान खाद के लिए सड़कों पर क्यों भटक रहे होते? देश के कई हिस्सों से खबरें आईं कि किसानों को घंटों लाइन में खड़े रहना पड़ा, कई जगह पुलिस की लाठियां तक चलीं. क्या यही “किसान केंद्रित नीति” है?
सरकार कहती है कि विकट परिस्थितियों के बावजूद उर्वरक समय पर किसानों तक पहुंचाया गया. लेकिन जमीनी सच्चाई इससे उलट दिखती है. अगर व्यवस्था इतनी मजबूत है, तो हर साल खाद की किल्लत क्यों होती है? क्यों बुवाई के समय किसान सबसे ज्यादा परेशान होते हैं? रिकॉर्ड उत्पादन और आयात के दावे तब बेमानी लगते हैं, जब किसान को जरूरत के समय खाद नहीं मिलती.
चिंतन शिविर में सही तरीके से खाद का उपयोग और टिकाऊ खेती पर चर्चा हुई. यह बात सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन जब किसान को एक ही खाद के लिए कई दिन दौड़ना पड़े, तो संतुलन अपने आप बिगड़ जाता है. मजबूरी में किसान वही खाद खरीदता है, जो उसे मिल जाए, न कि वह जो खेत के लिए सही हो. इस असंतुलन की जिम्मेदारी सिर्फ किसान की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है.
राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने भारत को 2047 तक विकसित बनाने की बात कही. लेकिन किसान आज के साल में ही बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है. जब तक गांव का किसान सुरक्षित और सम्मान के साथ खेती नहीं कर पाएगा, तब तक विकसित भारत का सपना सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगा.
चिंतन शिविर में 15 समूहों ने उर्वरक, आत्मनिर्भरता, डिजिटल सिस्टम और सब्सिडी पर चर्चा की. मंत्री और सचिवों ने सुझाव सुने. लेकिन सवाल यह है कि क्या इन चर्चाओं का असर खेत तक पहुंचेगा? किसान को आज भी यही लगता है कि फैसले कागजों में होते हैं और परेशानियां जमीन पर.
सरकार, पीएसयू और निजी कंपनियां जब “इकोसिस्टम” की बात करती हैं, तो किसान उसमें सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाता है. किसान को सम्मान, समय पर खाद और बिना डर खेती करने का अधिकार चाहिए. जब तक खाद के लिए लाइन, अपमान और लाठी की खबरें आती रहेंगी, तब तक किसी भी चिंतन शिविर की सफलता पर सवाल उठते रहेंगे.
अगर सच में किसानों को केंद्र में रखना है, तो पहले उनकी रोज की समस्याओं को स्वीकार करना होगा. सिर्फ मंचों से तारीफों के पुल बांधने से खेती नहीं सुधरेगी. खाद की उपलब्धता, पारदर्शी वितरण और किसानों से सीधा संवाद ही असली समाधान है. वरना चिंतन शिविर होते रहेंगे और किसान सजा काटता रहेगा.
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