
देश में किसानों को बेचे जाने वाले नकली कीटनाशकों की समस्या से छुटकारा पाने में राष्ट्रीय समेकित कीट प्रबंधन प्रणाली यानी IPMS बड़ी भूमिका निभा सकती है. कृषि मंत्रालय में सीआईबी एंड आरसी के सचिव डॉ. सुभाष चंद का कहना है कि अगर इस व्यवस्था को पूरी तरह लागू कर दिया जाए तो नकली कीटनाशकों की समस्या को जड़ से खत्म किया जा सकता है.
डॉ. चंद ने यह बात 17 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में क्रॉपलाइफ इंडिया की ओर से आयोजित ‘एआई फॉर एग्रीकल्चर ट्रांसफॉर्मेशन’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन में कही.
राष्ट्रीय IPMS डेटाबेस में स्थापित डीलर नेटवर्क के जरिए कीटनाशक उत्पादों की प्रामाणिकता की जांच के साथ उनकी ट्रैकिंग की व्यवस्था है. ऐसे में इसके पूरी तरह इस्तेमाल से किसानों तक नकली उत्पादों को पहुंचने से रोकने में मदद मिल सकती है.
डॉ. सुभाष चंद ने फसल सुरक्षा उद्योग से मिलकर एक ऐसा AI आधारित टूल या मोबाइल ऐप विकसित करने की अपील की, जिसकी मदद से किसानों के लिए खेत में कीटों की पहचान करना आसान हो सके.
इस तकनीक की मदद से किसान यह भी समझ सकेंगे कि किसी कीट के नियंत्रण के लिए कौन सा कीटनाशक इस्तेमाल करना है, उसे कब इस्तेमाल करना है और उसकी सही मात्रा क्या होनी चाहिए।
उनके मुताबिक, इस तरह की तकनीक किसानों को वैज्ञानिक और जिम्मेदारी के साथ फसल सुरक्षा के उपाय अपनाने में मदद कर सकती है.
सम्मेलन में फसल सुरक्षा उद्योग की भविष्य की तस्वीर पर भी चर्चा हुई. क्रॉपलाइफ इंडिया फसल सुरक्षा क्षेत्र में काम करने वाली 17 अनुसंधान और विकास आधारित कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है.
क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन के कार्यकारी चेयरमैन और प्रबंध निदेशक अंकुर अग्रवाल ने कहा कि आने वाले वर्षों में उद्योग में व्यावहारिक नवाचार बढ़ेंगे और रोबोटिक्स भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
रैलिस इंडिया के एमडी और सीईओ डॉ. ज्ञानेंद्र शुक्ला के मुताबिक भविष्य में डिजिटल माध्यमों की अहमियत काफी बढ़ जाएगी और AI उद्योग के विकास के अगले चरण को परिभाषित कर सकता है.
वहीं बायर क्रॉपसाइंस के सीओओ मोहन बाबू ने कहा कि आने वाले समय में फसल सुरक्षा केवल रासायनिक या जैविक उत्पादों तक सीमित नहीं रहेगी. इसमें AI, बेहतर बीज और जीन एडिटिंग जैसी तकनीकों को मिलाकर एक एकीकृत नजरिया अपनाया जा सकता है.
BASF एग्रीकल्चरल सॉल्यूशंस के बिजनेस डायरेक्टर गिरिधर रनुवा ने खेती पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का मुद्दा उठाया. उनके मुताबिक आने वाले समय में परिणाम आधारित खेती की अहमियत बढ़ सकती है.
धानुका एग्रीटेक के प्रबंध निदेशक राहुल धानुका ने कहा कि भारत में तैयार होने वाले AI आधारित समाधान खेती में मशीनों और आधुनिक तकनीक की पहुंच बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.
सम्मेलन के दौरान क्रॉपलाइफ इंडिया और यस बैंक की साझेदारी में ‘इनोवेशन इन क्रॉप प्रोटेक्शन सेक्टर’ नाम से एक रिपोर्ट भी जारी की गई.
रिपोर्ट के मुताबिक शहरीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव के चलते 2050 तक भारत का शुद्ध बोया गया क्षेत्र करीब 10 प्रतिशत तक घट सकता है. ऐसी स्थिति में कम जमीन से ज्यादा और बेहतर उत्पादन हासिल करना खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाएगा.
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्तमान में कीटों और बीमारियों की वजह से भारत को हर साल करीब 2 लाख करोड़ रुपये मूल्य की कृषि उपज का नुकसान होता है. जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में यह चुनौती और बढ़ सकती है.
ऐसे में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ाने के साथ कीट और बीमारियों से होने वाले नुकसान को कम करने की जरूरत पर जोर दिया गया है.
रिपोर्ट में फसल सुरक्षा क्षेत्र में कई नीतिगत बदलावों की जरूरत बताई गई है. इनमें डिजिटलीकरण बढ़ाना, किसानों तक कृषि विस्तार सेवाओं की पहुंच मजबूत करना और घरेलू रिसर्च एवं डेवलपमेंट को प्रोत्साहन देना शामिल है.
इसके अलावा सभी राज्यों में मान्य ‘वन नेशन, वन लाइसेंस’ की व्यवस्था और नए फसल सुरक्षा उत्पादों के लिए पांच साल के रेगुलेटरी डेटा प्रोटेक्शन यानी RDP जैसे प्रोत्साहन की वकालत की गई है.
सम्मेलन में अलग-अलग टेक्नोलॉजी कंपनियों ने कृषि में AI के इस्तेमाल से जुड़े अपने काम के बारे में जानकारी दी.
आईबीएम रिसर्च इंडिया के डायरेक्टर अमित सिंघी ने कंपनी के ‘पृथ्वी’ फाउंडेशनल AI मॉडल के बारे में बताया. सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से फसलों की मैपिंग में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसी तकनीक फसल बीमा और पैदावार का अनुमान लगाने जैसे कामों में मददगार हो सकती है.
माइक्रोसॉफ्ट में डायरेक्टर, पब्लिक सेक्टर एशिया, सपना नौहरिया ने बताया कि कंपनी ATD बारामती प्रोजेक्ट को अन्य राज्यों तक पहुंचाने की योजना बना रही है. इस परियोजना में AI के जरिए किसानों को वास्तविक समय में कीटों से जुड़े अलर्ट उपलब्ध कराने पर काम किया जा रहा है.
महिंद्रा एंड महिंद्रा के फार्म इक्विपमेंट बिजनेस में चीफ ऑफ एडवांस्ड टेक्नोलॉजी रुचा नानावटी के मुताबिक कंपनी का ध्यान अब केवल ट्रैक्टर तक सीमित नहीं है. खेती के पूरे चक्र में किसानों के लिए AI आधारित स्मार्ट सलाह देने वाले समाधान तैयार करने पर भी काम किया जा रहा है.
सैटश्योर एनालिटिक्स की अश्वथी नांबियार ने सैटेलाइट डेटा से किसानों के जोखिमों का पूर्वानुमान लगाने में AI के इस्तेमाल के बारे में जानकारी दी. वहीं जनरल एयरोनॉटिक्स के संस्थापक और सीईओ अभिषेक बर्मन ने AI और ड्रोन इमेजिंग के जरिए कृषि इनपुट के इस्तेमाल को अधिक प्रभावी बनाने की संभावनाओं का जिक्र किया.
कुल मिलाकर सम्मेलन का जोर इस बात पर रहा कि आने वाले वर्षों में AI, डिजिटल तकनीक, सैटेलाइट, ड्रोन और ट्रैक-एंड-ट्रेस सिस्टम खेती और फसल सुरक्षा के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव ला सकते हैं. किसानों के स्तर पर इन तकनीकों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितनी आसान, भरोसेमंद और सुलभ बनाई जाती हैं.