Barley Farming Tips: जौ किसान समय रहते उठाएं ये कदम, एक्सपर्ट्स ने जारी की सलाह

Barley Farming Tips: जौ किसान समय रहते उठाएं ये कदम, एक्सपर्ट्स ने जारी की सलाह

जौ की फसल तेज बढ़वार वाली जरूर है, लेकिन सही जल प्रबंधन और खरपतवार नियंत्रण न हो तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है. सीमित सिंचाई में बेहतर उपज कैसे लें और किन दवाओं से खरपतवार पर काबू पाया जाए, इससे जुड़ी अहम जानकारी किसानों के लिए बेहद काम की है.

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क‍िसान तक
  • Noida,
  • Jan 03, 2026,
  • Updated Jan 03, 2026, 8:30 AM IST

रबी सीजन में जौ की खेती किसानों के लिए एक सुरक्षित और कम लागत वाला विकल्प मानी जाती है. सीमित जल उपलब्धता में भी अच्छी उपज देने की क्षमता के कारण यह फसल बदलते मौसम और बढ़ती खेती लागत के दौर में खास महत्व रखती है. सही समय पर सिंचाई, संतुलित पोषण और खरपतवार नियंत्रण से जौ की पैदावार और गुणवत्ता दोनों को बेहतर बनाया जा सकता है. पढ़ें एक्‍सपर्ट्स की सलाह...

जल प्रबंधन पर खास ध्यान जरूरी

जौ की खेती में अन्य अनाज फसलों की तुलना में पानी की जरूरत कम होती है. सामान्य परिस्थितियों में 2 से 3 सिंचाई पर्याप्त मानी जाती है. अगर किसान के पास केवल एक ही सिंचाई का संसाधन है, तो उसे बुआई के 30-35 दिन बाद कल्ले बनने की अवस्था में देना सबसे लाभकारी रहता है. 

दो सिंचाई उपलब्ध होने पर पहली सिंचाई सक्रिय कल्ले फूटने की अवस्था यानी बुआई के 25-30 दिन बाद और दूसरी सिंचाई बाली आने के समय बुआई के 65-70 दिन बाद करनी चाहिए.

 क्षारीय और लवणीय भूमि में भारी सिंचाई की बजाय हल्की लेकिन अधिक बार सिंचाई करना बेहतर माना जाता है. सिंचाई के बाद नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा 66 किलोग्राम यूरिया प्रति हैक्टर की दर से टॉप ड्रेसिंग के रूप में देना फसल के लिए फायदेमंद होता है.

खरपतवार नियंत्रण से बढ़ेगी उपज

जौ की फसल तेजी से बढ़ती है और सामान्य तौर पर खरपतवारों को पनपने का ज्यादा मौका नहीं देती. फिर भी अधिक खरपतवार होने की स्थिति में नियंत्रण जरूरी हो जाता है. संकरी पत्ती वाले खरपतवार जैसे जंगली जई और गुल्ली डंडा के लिए पेण्डीमेथिलीन या आइसोप्रोट्यूरॉन का प्रयोग किया जा सकता है.  वहीं, चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार जैसे बथुआ और जंगली गाजर के नियंत्रण के लिए 2,4-डी आधारित दवाओं का छिड़काव बुआई के 30-35 दिन बाद करना प्रभावी रहता है.

कितना है जौ का MSP?

जौ की खेती को लेकर किसानों का भरोसा इसलिए भी मजबूत हुआ है, क्योंकि केंद्र सरकार ने रबी विपणन सत्र 2026-27 के लिए जौ का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर 2,150 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है. यह दर पिछले साल के 1,980 रुपये प्रति क्विंटल के मुकाबले 170 रुपये अधिक है, जिससे किसानों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है. यह MSP जौ की कटाई के बाद होने वाली बिक्री पर लागू होगा, जिससे बाजार में दाम गिरने की स्थिति में भी किसानों को सुरक्षा मिलेगी. 

सरकार की मोटे अनाजों को बढ़ावा देने की नीति, कम पानी में होने वाली खेती और पोषण सुरक्षा के लक्ष्य के साथ यह फैसला जुड़ा हुआ माना जा रहा है. बढ़े हुए MSP और सरकारी प्रोत्साहन से आने वाले समय में जौ का रकबा बढ़ने और किसानों की आय में सुधार की संभावना जताई जा रही है.

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