IIRR की DSR तकनीक का कमाल, धान की पैदावार में 13 फीसदी तक बढ़ोतरी

IIRR की DSR तकनीक का कमाल, धान की पैदावार में 13 फीसदी तक बढ़ोतरी

धान किसानों के लिए अच्छी खबर है. ICAR के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ राइस रिसर्च (IIRR) और SBI फाउंडेशन की एक पहल में सामने आया है कि डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक से पारंपरिक धान रोपाई की तुलना में 13 फीसदी ज्यादा उत्पादन मिल सकता है.

DSR तकनीक का कमालDSR तकनीक का कमाल
क‍िसान तक
  • Noida,
  • May 22, 2026,
  • Updated May 22, 2026, 12:31 PM IST

धान की खेती करने वाले किसानों के लिए एक अच्छी खबर सामने आई है. दरअसल, इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) के तहत काम करने वाले इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ राइस रिसर्च (IIRR) ने SBI फाउंडेशन SBI फाउंडेशन की एक पहल में सामने आया है कि डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक से पारंपरिक धान रोपाई की तुलना में 8 से 13 फीसदी ज्यादा उत्पादन मिल सकता है. साथ ही, इस तकनीक से प्रति एकड़ खेती की लागत 21 से 23 फीसदी तक कम हो सकती है. यानी किसानों को कम खर्च में ज्यादा पैदावार और बेहतर मुनाफा मिल सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक DSR तकनीक से पानी, समय और मजदूरी की भी बचत होती है

DSR तकनीक 35 फीसदी पानी की बचत

विशेषज्ञों के मुताबिक, नई तकनीक की मदद से धान की खेती अब और भी आसान और किफायती बनती जा रही है. IoT (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) आधारित सेंसर के इस्तेमाल से किसानों ने 25 से 35 फीसदी तक पानी की बचत करने में सफलता हासिल की है. IIRR के एक विशेषज्ञ ने बताया कि डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) ऐसी तकनीक है, जिसमें धान के बीज सीधे खेत में बो दिए जाते हैं. इसमें न तो नर्सरी तैयार करनी पड़ती है और न ही पौधों की अलग से रोपाई करनी होती है. इस तकनीक के अच्छे नतीजों को देखते हुए किसानों का रुझान तेजी से बढ़ा है. सिर्फ एक साल में परियोजना से जुड़े गांवों में DSR के तहत खेती का रकबा बढ़कर 5,947 एकड़ तक पहुंच गया है. इससे किसानों को करीब 7.73 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक लाभ होने का अनुमान है.

धान की खेती के लिए बेस्ट DSR तकनीक

विशेषज्ञ ने बताया कि DSR तकनीक को किसानों से अच्छा समर्थन मिल रहा है. इससे साफ है कि किसान अब ऐसी खेती की ओर बढ़ रहे हैं, जो कम पानी में ज्यादा उत्पादन दे और बदलते मौसम की चुनौतियों का सामना कर सके. IIRR की इस परियोजना को SBI फाउंडेशन की आर्थिक मदद से 2024-26 के दौरान तेलंगाना के नलगोंडा और खम्मम जिलों में लागू किया गया. इस कार्यक्रम में नई कृषि तकनीकों, आधुनिक मशीनों, वैज्ञानिक शोध और किसानों को प्रशिक्षण देने जैसे कई प्रयासों को एक साथ जोड़ा गया, ताकि धान की खेती को ज्यादा लाभदायक और टिकाऊ बनाया जा सके.

पारंपरिक धान की खेती में आ रही परेशानियां

बता दें कि भारत में करीब 4.7 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती की जाती है, जिससे हर साल लगभग 14 करोड़ टन चावल का उत्पादन होता है. तेलंगाना भी देश के प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में शामिल है, जहां 46 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में खेती होती है और करीब 1.7 करोड़ टन चावल पैदा होता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, धान की खेती इस समय कई चुनौतियों का सामना कर रही है. खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, पानी की खपत बहुत ज्यादा है, मजदूरों की कमी है और रोपाई में देरी जैसी समस्याएं किसानों को परेशान कर रही हैं. इसके अलावा पारंपरिक धान खेती से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी अधिक होता है.

DSR तकनीक में धान दो तरीकों से की जाती है खेती

DSR तकनीक में धान की खेती दो तरीकों से की जाती है. पहला सूखा DSR, जिसमें मॉनसून से पहले सूखी जमीन में मशीनों की मदद से सीधे बीज बोए जाते हैं. दूसरा गीला DSR, जिसमें अंकुरित बीजों को गीले खेतों में हाथ से या ड्रम सीडर की मदद से बोया जाता है. इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कम बीज, कम पानी और कम मजदूरी की जरूरत पड़ती है. इससे खेती की लागत घटती है और किसान फसल की कटाई भी करीब 10 दिन पहले कर सकते हैं. इससे अगली फसल की तैयारी के लिए भी ज्यादा समय मिल जाता है.

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