
ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं को संतुलित आहार देना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है. बाजार में मिलने वाले सप्लीमेंट इतने महंगे होते हैं कि छोटे किसान उन्हें खरीद नहीं पाते, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है. पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के रहने वाले 39 वर्षीय कर्णदेब रॉय ने पशुपालन के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव पेश किया है. 27 वर्षों के लंबे अनुभव और मात्र मैट्रिक तक की शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद, उन्होंने ग्रामीण किसानों की सबसे बड़ी समस्या—पशुओं के लिए महंगे और पोषक आहार—का समाधान खोज निकाला है. उन्होंने एक यूरिया मिनरल मोलासेस ब्लॉक मेकर मशीन विकसित की है, जो पशुओं के लिए पोषण से भरपूर ब्लॉक तैयार करती है. ये ब्लॉक पशुओं के लिए एक बेहतरीन पूरक आहार है, जिन्हें चाटने से गायों और बकरियों को जरूरी खनिज और विटामिन मिलते हैं. इस नवाचार का मुख्य उद्देश्य गरीब और मध्यम वर्गीय किसानों को बाजार की निर्भरता से मुक्त कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है.
कर्णदेब रॉय द्वारा विकसित यह मशीन न केवल मजबूत है, बल्कि इसे खेतों और घरों में आसानी से चलाने के लिए बहुत सरल बनाया गया है. इसकी तकनीकी विशेषताओं की बात करें तो इसकी लंबाई 22 इंच, चौड़ाई 11.5 इंच और ऊंचाई 36 इंच है. लगभग 65 किलो वजन वाली इस मशीन को किसान अपनी जरूरत के हिसाब से कहीं भी ले जा सकते हैं, और उपयोगकर्ता की पसंद के आधार पर पोर्टेबिलिटी के लिए इसके वजन को और भी कम करने की गुंजाइश है. उत्पादन के मामले में यह बहुत कुशल है और एक घंटे में 20 से 25 पोषक ब्लॉक तैयार कर सकती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी यूनिट की लागत केवल 9,000 रुपये है, जो इसे छोटे और प्रगतिशील किसानों के लिए एक बहुत ही किफायती निवेश बनाती है.
इस मशीन से बने ब्लॉक्स के इस्तेमाल से पशुओं की उत्पादकता में असाधारण सुधार देखा गया है. आंकड़ों के अनुसार, इसके उपयोग से डेयरी गायों के दूध उत्पादन में 23% की वृद्धि हुई है. इसके अलावा, बकरियों के शारीरिक वजन में 21% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. जब पशुओं का दूध और वजन बढ़ता है, तो बाजार में उनकी कीमत भी बढ़ जाती है. यह सीधा फायदा छोटे किसानों की जेब तक पहुंचता है, जिससे उनकी जीवनशैली और आय में बड़ा सुधार होता है.
कर्णदेब रॉय के इस आविष्कार ने न केवल पशुओं का स्वास्थ्य सुधारा है, बल्कि ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी खोले हैं. अब किसान अपने पशुओं के लिए पोषक आहार खुद अपने फार्म पर तैयार कर सकते हैं, जिससे उनका खर्च कम होता है. दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले युवा इस मशीन के माध्यम से ब्लॉक बनाकर बेचने का व्यवसाय शुरू कर सकते हैं. यह ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देता है और पशुपालन को एक घाटे के सौदे के बजाय एक सफल और सम्मानजनक व्यवसाय में बदल देता है.
इस नवाचार में भविष्य को बदलने की अपार क्षमता है. इस तकनीक को किसान उत्पादक संगठनों और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से देश के कोने-कोने तक पहुंचाया जा सकता है. हालांकि इसके व्यापक प्रसार के लिए अभी वैज्ञानिक सत्यापन की प्रक्रिया जरूरी है, लेकिन शुरुआती परिणाम बहुत ही उत्साहजनक हैं. यदि सरकारी और निजी स्तर पर ग्रामीण प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इस मशीन को शामिल किया जाए, तो यह भारतीय पशुपालन क्षेत्र को आधुनिक, टिकाऊ और अधिक लाभदायक बनाने में मील का पत्थर साबित होगी.
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