
अल नीनो के संभावित असर और बदलते मौसम के बीच धान किसानों की चिंता बढ़ गई है. कभी देर से आने वाला मॉनसून तो कभी अचानक तेज बारिश, खेती-किसानी के पूरे चक्र को प्रभावित कर रही है. ऐसे समय में बिहार के किसानों के लिए कृषि विभाग ने चरणबद्ध धान नर्सरी तकनीक की जानकारी दी है, जो ऐसे समय में किसानों के लिए एक नई उम्मीद बनकर सामने आई है. इस तकनीक से किसान एक साथ पूरी फसल पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग समय पर नर्सरी तैयार कर सकते हैं, जिससे मौसम की मार से बचाव होगा और समय पर धान की रोपाई की जा सकेगी. खासकर अल नीनो जैसी मौसमी घटनाओं के कारण पैदा होने वाली परेशानियों के बीच यह तकनीक किसानों के लिए सुरक्षा कवच साबित हो सकती है. आइए जानते हैं कैसे?
चरणबद्ध धान नर्सरी तकनीक के जरिए तीन चरण में नर्सरी तैयार की जाती है. पहले चरण में किसान मॉनसून से पहले धान की नर्सरी तैयार करते हैं. इसमें बीज की बुवाई के बाद करीब 25 से 28 दिन में पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं. ये समय जून के पहले पखवाड़े वाला होता है. वहीं, दूसरे चरण में पहली नर्सरी के कुछ दिन बाद दोबारा बीज बोए जाते हैं. ये नर्सरी जून के अंत में तैयार की जाती है. इस नर्सरी को मध्यम अवधि की बारिश और रोपाई के लिए तैयार कर सकते हैं. इसके अलावा तीसरे चरण में जुलाई के शुरूआती 15 दिनों में नर्सरी तैयार की जाती है, जिससे देर से आने वाले मॉनसून या किसी अन्य समस्या की स्थिति में किसानों को धान की खेती करने का मौका मिलता है.
इस विधि में किसान सामुदायिक चरणबद्ध धान नर्सरी भी तैयार कर सकते हैं. इसमें एक गांव के कई किसान मिलकर एक ही स्थान पर धान की पौध तैयार करते हैं. इसमें एक साथ पूरी नर्सरी लगाने के बजाय अलग-अलग समय और अंतराल पर नर्सरी तैयार की जाती है. आमतौर पर हर चरण के बीच करीब 25 से 28 दिनों का अंतर रखा जाता है. इसका फायदा यह होता है कि अगर पहली नर्सरी खराब मौसम, ज्यादा बारिश या सूखे की वजह से खराब हो जाती है, तो किसानों के पास दूसरी और तीसरी नर्सरी से तैयार पौध उपलब्ध रहती है. इससे धान की रोपाई समय पर हो पाती है और फसल नुकसान का खतरा कम हो जाता है.
चरणबद्ध धान नर्सरी तकनीक से किसानों को कई फायदे हो सकते हैं. सबसे बड़ा फायदा ये है कि मौसम की अनिश्चितता के बावजूद धान की रोपाई समय पर की जा सकती है. इससे फसल खराब होने का खतरा कम होता है और उत्पादन में स्थिरता आती है. वहीं,
इस तकनीक से किसानों को मजदूरों और संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने में भी मदद मिलती है. एक साथ ज्यादा काम का दबाव नहीं पड़ता और किसान अपनी सुविधा के अनुसार खेतों में रोपाई कर सकते हैं.
बिहार में इस तकनीक के प्रयोग को लेकर सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं. राज्य के कई क्षेत्रों में किसानों ने इसे अपनाकर मौसम आधारित जोखिम को कम करने की कोशिश की है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी तकनीक किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती हैं. धान की खेती में पानी की अधिक जरूरत होती है, लेकिन मौसम में बदलाव के कारण जल प्रबंधन भी बड़ी चुनौती बन गया है. चरणबद्ध नर्सरी विधि से किसान उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं.
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में खेती को मौसम के बदलाव के अनुसार ढालना जरूरी होगा. चरणबद्ध धान नर्सरी विधि कम लागत में किसानों को जोखिम से बचाने वाली तकनीक है. ऐसे में अगर अधिक किसान इस तकनीक को अपनाते हैं तो बिहार में धान उत्पादन को बढ़ावा मिल सकता है और किसानों की आय में भी सुधार की संभावना बढ़ेगी. यह तकनीक खासकर उन किसानों के लिए उपयोगी है जो मॉनसून पर निर्भर होकर खेती करते हैं.