पराली से बनेगा बायो-बिटुमेन, किसानों की आय बढ़ाने पर बोले कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान

पराली से बनेगा बायो-बिटुमेन, किसानों की आय बढ़ाने पर बोले कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान

पराली से बायो-बिटुमेन बनाने की नई तकनीक किसानों की आय बढ़ाने, प्रदूषण कम करने और आयात घटाने में मदद करेगी. यह पहल आत्मनिर्भर भारत और वेस्ट-टू-वेल्थ की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है.

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क‍िसान तक
  • New Delhi ,
  • Mar 30, 2026,
  • Updated Mar 30, 2026, 6:49 PM IST

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को सीएसआईआर मुख्यालय, अनुसंधान भवन, नई दिल्ली में आयोजित “लिग्नोसेल्युलोसिक बायोमास से बायो-बिटुमेन – फार्म रेजिड्यू टू रोड्स” विषय पर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कार्यक्रम में कहा कि पराली से बायो-बिटुमेन बनाकर सड़क निर्माण तक का यह सफर सचमुच ऐतिहासिक, शानदार और भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाला कदम है. उन्होंने इसे किसानों की आय बढ़ाने, पर्यावरण संरक्षण, आत्मनिर्भरता और स्वदेशी टेक्नोलॉजी– इन चारों लक्ष्यों को एक साथ साधने वाली पहल बताया और वैज्ञानिकों की पूरी टीम को हृदय से बधाई दी. समारोह में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, वैज्ञानिक और किसान भी शामिल हुए.

पराली समस्या से समाधान तक

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह ने कहा कि पहले गांवों में पराली के अनेक उपयोग थे– बैलों के लिए भूसा, घरों के छज्जे और अन्य काम– इसलिए उसे जलाने की प्रथा नहीं थी, लेकिन आधुनिक साधनों के साथ यह उपयोग घटते गए और आज किसान को धान काटकर तुरंत गेहूं बोने के लिए पंद्रह–बीस दिन भी नहीं मिलते, इसलिए वह मजबूरी में पराली जला देता है. उन्होंने बताया कि सरकार ने डायरेक्ट सीडिंग जैसी कई वैकल्पिक पद्धतियां विकसित की हैं, जिसके कारण पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली जलाने की घटनाएं घटी हैं, लेकिन बायो-बिटुमेन ने “आम के आम और गुठलियों के दाम” की तरह पराली को अतिरिक्त आय का स्रोत बना दिया है. 

चौहान ने कहा कि जैसे नालियों में बहाया जाने वाला बेकार तेल अब मूल्यवान संसाधन बन गया, वैसे ही अब किसानों की पराली भी पैसे में बदलेगी, उनकी आय बढ़ेगी और पर्यावरण की रक्षा होगी.

आत्मनिर्भर भारत और आयात पर निर्भरता घटाने की ठोस राह

चौहान ने जोर देकर कहा कि आज की दुनिया में भारत किसी पर निर्भर रहकर नहीं चल सकता, इसलिए आत्मनिर्भर बनना अनिवार्य है, क्योंकि “पता नहीं कब कौन सी चीज रुक जाए, किसका क्या गड़बड़ हो जाए.” उन्होंने बताया कि बायो-बिटुमेन के माध्यम से बिटुमेन आयात में कमी आने से देश को लगभग साढ़े चार हजार करोड़ रुपये का सीधा लाभ होने की संभावना है, जो आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को ठोस आधार देगा. शिवराज सिंह ने कहा कि जब नीति सही, नियत स्पष्ट और नेता नरेंद्र मोदी जी जैसा हो, तब एक कदम से अनेकों समस्याओं के समाधान निकलते चले जाते हैं और वही आज इस कार्यक्रम के माध्यम से दिखाई दे रहा है.

“जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय अनुसंधान” 

उन्होंने जोर दिया कि यह कार्यक्रम केवल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं, बल्कि “मिट्टी की महक को मशीन की महत्ता से जोड़ने”, “खेत के अवशेष को देश के विशेष गौरव में बदलने” और “खेत, खलिहान और विज्ञान के विधान का गठबंधन” करने वाला ऐतिहासिक अवसर है. मंत्री चौहान ने वैज्ञानिकों, सड़क परिवहन क्षेत्र और किसानों को बधाई देते हुए कहा कि सिलचर से तिरुपति बालाजी तक और आगे पूरे देश में ऐसी सड़कों का जाल बिछे, आयात पर निर्भरता समाप्त हो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में “जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय अनुसंधान” का नारा विकसित भारत के सशक्त संकल्प के रूप में गूंजता रहे.

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि खाड़ी क्षेत्र में जारी युद्ध और बार‑बार उठ रही आत्मनिर्भरता की आवश्यकता के बीच यह बायो-बिटुमेन से जुड़ा कार्यक्रम बेहद महत्वपूर्ण समय पर आयोजित किया जा रहा है, क्योंकि दुनिया दूसरे देशों से आयात घटाने के विकल्प खोज रही है, जबकि भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 से ही आत्मनिर्भर भारत का मंत्र देकर तैयारियां शुरू कर दी थीं. 

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कोविड आपदा के समय भारत अपना वैक्सीन खुद विकसित कर सका, किसानों तक सीधे लाभ पहुंचाने के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की व्यवस्था पहले से तैयार थी और जनधन योजना के कारण किसी गरीब को खाली पेट सोने से बचाने की ऑनलाइन व्यवस्था पहले ही बन चुकी थी, जो किसी भी दूरदर्शी नेतृत्व की असली पहचान है.

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सीएसआईआर‑सीआरआरआई और अन्य संस्थानों के समन्वय से बायो-बिटुमेन का सफल प्रयोग एक साथ कई प्रमाणिकताएं स्थापित करता है– पहली, यह कि फॉसिल फ्यूल्स, पेट्रोल और कोयले पर भारत की निर्भरता घटेगी और नेट‑जीरो लक्ष्य की दिशा में बड़ा कदम उठेगा. दूसरी, यह कि अब सड़क निर्माण में भी मेक इन इंडिया की ठोस भागीदारी होगी और वेस्ट‑टू‑वेल्थ की अवधारणा के तहत पराली जैसे क्रॉप रेसिड्यू से मूल्यवान उत्पाद तैयार कर आयातित बिटुमेन पर होने वाला 25 से 35 हजार करोड़ रुपये तक का खर्च घटाया जा सकेगा.

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