
गेहूं की फसल पकने की ओर बढ़ रही है, लेकिन किसानों की मेहनत को खतरा मंडरा रहा है. इसी क्रम में चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के निदेशक शोध डॉ आरके यादव ने बताया कि गेहूं की फसल में पहली और दूसरी सिंचाई का बहुत महत्व है. उन्होंने कहा कि कुल उत्पादन का 30 से 40% भाग पहली और दूसरी सिंचाई पर निर्भर है. पहली सिंचाई फसल बुवाई के 20 से 21 दिन बाद करना चाहिए. डॉ यादव ने बताया कि गेहूं की फसल में पहली सिंचाई सबसे महत्त्वपूर्ण मानी जाती है इसे 'सीआरआई' यानी जड़ फुटान की अवस्था कहते हैं. बुवाई के करीब 20 से 21 दिन बाद जब पौधे में जड़ों का विकास शुरू होता है. तब नमी की कमी से पौधे कमजोर रह जाते हैं.
उन्होंने बताया कि इस समय हल्का पानी देने से कल्लों की संख्या बढ़ती है. दूसरी सिंचाई फसल बुवाई के 40 से 50 दिन बाद की जानी चाहिए. यह वह समय होता है जब पौधे के तनों का विकास तेजी से हो रहा होता है. इस दौरान पौधों को पोषक तत्वों की अधिक आवश्यकता होती है. डॉ यादव बताते हैं कि समय पर पानी मिलने से नाइट्रोजन का अवशोषण बेहतर होता है. इससे पौधे की ऊंचाई और मजबूती बढ़ती है. सिंचाई में लापरवाही इस अवस्था में पौधों को पीला बना सकती है. वहीं सिंचाई करते समय विधि का चुनाव भी उत्पादन पर असर डालता है.
जबकि क्यारी बनाकर सिंचाई करना सबसे उत्तम रहता है ताकि पानी पूरे खेत में समान रूप से पहुंचे. ज्यादा पानी भरने से जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जिससे फसल पीली पड़ जाती है. आधुनिक तकनीकों मिनी स्प्रिंकलर का प्रयोग भी किया जा सकता है. जो कम पानी में बेहतर नमी देने में सक्षम है.
डॉ यादव ने किसानों को सलाह दी है कि गेहूं फसल में यूरिया और जिंक सल्फेट का उचित मात्रा व उचित समय पर प्रयोग अवश्य करें. साथ ही चौड़ी और सकरी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए मेटासल्फ्यूरान और सल्फोसल्फ्यरान की 16 ग्राम के एक पैकेट को 200 लीटर पानी में घोलकर उचित नमी पर छिड़काव करें. जिससे किसानों को गेहूं उत्पादन से भरपूर लाभ प्राप्त हो सके.
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