
कभी बुंदेलखंड पानी की कमी के चलते सुख की मार झेलता था लेकिन अब समय बदल चुका है बुंदेलखंड में हर तरफ नहरों का जाल बिछ चुका है जिसकी वजह से अब खेतों में सूखा नहीं बल्कि हरियाली ही हरियाली दिख रही है. यहां के हमीरपुर जनपद में कृषि के क्षेत्र में खूब तरक्की की है. हमीरपुर कभी पानी की भारी कमी के कारण यहां के किसान मोटे अनाज तक सीमित थे, लेकिन अब नहर परियोजना और अन्य बड़े जल स्रोतों की मदद से खेती की तस्वीर बदल चुकी है. सिंचाई सुविधा बढ़ने के बाद किसान दलहन और नकदी फसलों की ओर तेजी से बढ़े हैं.
जनपद का राठ क्षेत्र कृषि के लिहाज से उन्नत माना जाता है. यहां रबी सीजन में चना और मटर, जबकि खरीफ में उड़द और मूंग की खेती बड़े पैमाने पर होती है. इसके साथ ही गन्ना इस इलाके की प्रमुख नकदी फसल बन चुका है.
इटौरा, अमरा और आसपास के गांवों में गन्ने की खेती व्यापक स्तर पर हो रही है. खास बात यह है कि कई किसानों ने खेतों में ही छोटे-छोटे पिराई संयंत्र लगा रखे हैं, जहां सुबह से शाम तक गुड़ बनाने का काम चलता है.
यहां बनने वाला गुड़ पारंपरिक बड़े आकार (7 से 10 किलो) में तैयार किया जाता है. छोटे आकार या अलग-अलग वैरायटी का गुड़ लगभग नहीं बनाया जाता. किसान सीधे मंडी में गुड़ बेच देते हैं.
फिलहाल मंडी में गुड़ का भाव करीब 35 रुपये प्रति किलो चल रहा है, जो किसानों के अनुसार लागत और मेहनत के मुकाबले कम है. गिरते दामों ने उनकी आमदनी पर असर डाला है.
किसान मुकेश और अन्य किसानों का कहना है कि उत्पादन अच्छा होने के बावजूद वे तकनीक और बाजार की जानकारी के अभाव में पिछड़ रहे हैं. छोटे आकार और वैरायटी वाला गुड़ बनाने में अधिक समय और मेहनत लगती है, इसलिए वे बड़े आकार का गुड़ बनाना ही व्यावहारिक मानते हैं.
इसके विपरीत मेरठ जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों में किसान अलग-अलग आकार, स्वाद और पैकिंग के साथ गुड़ तैयार कर सीधे बाजार में बेचते हैं. इससे उन्हें बेहतर दाम और अधिक लाभ मिलता है.
हमीरपुर के किसानों की स्थिति साफ संकेत देती है. यहां किसानों को आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और बेहतर बाजार संपर्क की आवश्यकता है. यदि किसानों को मूल्य संवर्धन (Value Addition), पैकेजिंग और ब्रांडिंग से जोड़ा जाए तो हमीरपुर में गन्ना और गुड़ उत्पादन किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन सकता है.
कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों का मानना है कि सही मार्गदर्शन और बाजार तक सीधी पहुंच मिलने पर यह क्षेत्र न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि प्रदेश के अन्य हिस्सों के लिए भी मॉडल साबित हो सकता है.