Paddy Farming: पछेती धान की खेती के लिए बेस्ट हैं बासमती की ये 5 किस्में, मिलेगी बंपर पैदावार

Paddy Farming: पछेती धान की खेती के लिए बेस्ट हैं बासमती की ये 5 किस्में, मिलेगी बंपर पैदावार

अगर जुलाई में धान की नर्सरी लगाने में देरी हो गई है, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पूसा बासमती की कुछ उन्नत किस्में पछेती खेती के लिए बेहद उपयुक्त हैं. ये किस्में कम समय में तैयार होने के साथ अच्छी पैदावार देती है. आइए जानते हैं उनकी खासियत.

धान की बुवाई में देरीधान की बुवाई में देरी
संदीप कुमार
  • Noida,
  • Jul 10, 2026,
  • Updated Jul 10, 2026, 1:38 PM IST

अगर किसी वजह से आप समय पर धान की नर्सरी नहीं डाल पाए हैं, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है. दरअसल, बिहार और उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए अभी भी धान की रोपाई और नर्सरी तैयार करने का मौका है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जुलाई में पछेती यानी देर से रोपाई के लिए पूसा की कई उन्नत बासमती किस्में उपलब्ध हैं, जो कम समय में तैयार होने के साथ-साथ बेहतर उत्पादन और शानदार खुशबू के लिए भी मशहूर हैं. इन किस्मों की बाजार में अच्छी मांग रहती है, जिससे किसानों को सामान्य धान की तुलना में अधिक कीमत मिलने की संभावना रहती है. आइए जानते हैं बासमती धान की ऐसी 5 बेहतरीन पछेती किस्मों के बारे में.

पछेती खेती के लिए क्यों चुनें बासमती किस्में?

जुलाई में धान की नर्सरी डालने वाले किसानों के लिए ऐसी किस्मों का चयन करना जरूरी होता है, जिसकी अवधि कम हो और जो देर से रोपाई के बावजूद अच्छी पैदावार दें. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) द्वारा विकसित पूसा बासमती की कई किस्में इसी जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं. इन किस्मों की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इनमें बेहतरीन सुगंध, लंबा दाना, अच्छी क्वालिटी और निर्यात की संभावना होती है. यही वजह है कि बासमती धान की कीमत सामान्य धान की तुलना में अधिक होती है.

पछेती खेती के लिए ये हैं 5 बेहतरीन किस्में

1. पूसा बासमती 1509: यह सबसे लोकप्रिय और जल्दी पकने वाली बासमती किस्मों में से एक है. इसकी फसल लगभग 115 से 120 दिनों में पककर तैयार हो जाती है, इसलिए यह पछेती रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है. इस किस्म के पौधे मजबूत होते हैं और आसानी से गिरते नहीं हैं, जिससे फसल को नुकसान कम होता है. इसके दाने लंबे, पतले और पकने के बाद अच्छी खुशबू वाले होते हैं. यह किस्म अच्छी देखभाल के साथ अधिक पैदावार देती है और बाजार में इसकी मांग भी काफी अच्छी रहती है, जिससे किसानों को बेहतर कीमत मिलती है.

2. पूसा बासमती 1847: ये उच्च उत्पादन क्षमता और बेहतरीन क्वालिटी वाली बासमती किस्म है. इसके दाने लंबे, पतले और सुगंधित होते हैं. यह किस्म अच्छी बढ़वार के साथ किसानों को बेहतर उपज देने में सक्षम है. इसकी खुशबू और क्वालिटी के कारण घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात में भी इसकी अच्छी मांग रहती है. ये किस्म है जो लगभग 120 से 125 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. वहीं, इसका औसत उत्पादन लगभग 28 से 32 क्विंटल प्रति एकड़ है. यह किस्म बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (झुलसा) और ब्लास्ट (झोंका) रोगों के प्रति सहनशील है.

3. पूसा बासमती 1692: पूसा बासमती 1692 को विशेष रूप से बेहतर क्वालिटी और रोग सहनशीलता को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है. यह किस्म कई सामान्य रोगों के प्रति अन्य वैरायटी से अधिक सहनशील मानी जाती है, जिससे किसानों का जोखिम कम हो जाता है. इसके दाने लंबे, पतले और अच्छे क्वालिटी वाले होते हैं. यह किस्म देर से रोपाई की स्थिति में भी अच्छी पैदावार देती है, जिन किसानों की नर्सरी या रोपाई में देरी हो गई है, उनके लिए यह एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है.

4. पूसा बासमती 1121: ये भारत की सबसे प्रसिद्ध और सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली बासमती किस्मों में से एक है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि पकने के बाद इसके दाने काफी लंबे हो जाते हैं और इनमें शानदार प्राकृतिक खुशबू होती है. यही कारण है कि इस किस्म की देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी काफी मांग रहती है. वहीं, ये किस्म लगभग 140 से 145 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. इसकी औसत पैदावार 19 से 22 क्विंटल प्रति एकड़ होती है.

5. पूसा बासमती 1885: ये पछेती किस्मों की खेती के लिए एक नई  बासमती किस्म है, जिसे अधिक उत्पादन और बेहतर क्वालिटी को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है. यह किस्म पछेती खेती के लिए भी उपयुक्त मानी जाती है और कम समय में अच्छी उपज देने की क्षमता रखती है. इसके दाने लंबे, आकर्षक और सुगंधित होते हैं, जिससे बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है.

जुलाई में नर्सरी डालते समय रखें इन बातों का ध्यान

यदि जुलाई में धान की नर्सरी डाल रहे हैं, तो प्रमाणित और शुद्ध बीज का ही उपयोग करें. नर्सरी ऐसी जगह तैयार करें जहां पानी की निकासी की अच्छी व्यवस्था हो. बीज उपचार करने के बाद ही बुवाई करें, ताकि शुरुआती अवस्था में रोगों का खतरा कम रहे. साथी ही समय पर सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण और संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने से पौध मजबूत बनती है और रोपाई के बाद अच्छी बढ़वार मिलती है. 

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