अरहर में भी लगता है बांझपन का रोग, लक्षण और बचाव का उपाय जानिए

अरहर में भी लगता है बांझपन का रोग, लक्षण और बचाव का उपाय जानिए

जानकारों का कहना है कि बांझपन मोजेक वायरस एक तरह का रोग है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में बांझपन कहा जाता है. इस रोग की वजह से अरहर के उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है. क्योंकि यह अरहर के पौधे के प्रजनन अंगों को सबसे अधिक प्रभावित करता है.

अरहर की फसल में लगने वाले रोग. (सांकेतिक फोटो)अरहर की फसल में लगने वाले रोग. (सांकेतिक फोटो)
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Jan 16, 2024,
  • Updated Jan 16, 2024, 2:17 PM IST

भारत एक कृषि प्रधान देश है. यहां पर किसान धान, गेहूं, सरसों और मोटे अनाज के अलावा दलहनी फसलों की भी बड़े स्तर पर खेती करते हैं. यही वजह है कि अरहर के उत्पादन में भारत का कोई जोड़ नहीं है. भारत विश्व का सबसे बड़ा अरहर का उत्पादक है. यहां पर करीब 44 लाख हेक्टेयर में किसान अरहर की खेती करते हैं. जिससे करीब 35.69 लाख टन अरहर का उत्पादन होता है. लेकिन इसके बावजूद भी घरेलू डिमांड को पूरा करने के लिए अरहर का आयात करना पड़ता है. एक्सपर्ट का मानना है कि अरहर की फसल में कई तरह के रोग लगते हैं. इससे उत्पादन में गिरावट आती है. लेकिन सबसे ज्यादा फसल को नुकसान बांझपन मोजेक वायरस से होता है.

जानकारों का कहना है कि बांझपन मोजेक वायरस एक तरह का रोग है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में बांझपन कहा जाता है. इस रोग की वजह से अरहर के उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है. क्योंकि यह अरहर के पौधे के प्रजनन अंगों को सबसे अधिक प्रभावित करता है. इससे अरहर के पौधों में बांझपन के गुण आ जाते हैं और उपज कम हो जाती है. खास बात यह है कि इस रोग की वजह से अरहर की पत्तियां पीली हो जाती हैं. साथ ही पत्तों पर कई तरह के विकृतियां आ जाती हैं. इसके अलावा बांझपन मोजेक रोग के चलते पत्तियों का विकास रुक जाता है. इससे पत्तियों की साइज छोटी हो जाती है. 

बुवाई के 40 दिन बाद करें ये काम

बुवाई करने के 45 दिन के अंदर अगर अरहर की फसल में बांझपन रोग लग जाता है, तो फूल और कल्लियां अच्छी तरह से नहीं खिल पाएंगे. इससे अरहर के बीज उतने पुष्ट नहीं बनते हैं. इससे उपज में गिरावट आती है. अगर बुवाई करने के 40 दिन बाद आपके खेत में रोग से संक्रमित अरहर के पौधे दिखाई दें तो उन्हें खेत से निकाल दें, ताकि संक्रमण दूसरों पौधों तक नहीं फैले. इसके बावूजद भी संक्रमण फैलता है, तो किसान फेनाजाक्विन 1 मिली प्रति लीटर का छिड़काव अपने खेत में कर सकते हैं. यदि जरूरत पड़े 15 दिन के बाद फिर से फेनाजाक्विन का स्प्रे किया जा सकता है.

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कर्नाटक में सबसे अधिक प्रोडक्शन

बिहार, तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक में बांझपन रोग का असर अधिक देखने को मिलता है. खास बात यह है कि बिहार में 21.80 प्रतिशत अहर की फसल बांझपन रोग से प्रभावित होती है. इसके बाद तमिलनाडु का स्थान आता है, जहां 12.80 प्रतिशत फसल में बांझपन रोग लगता है. ऐसे सबसे अधिक अरहर का प्रोडक्शन कर्नाटक में होता है. यह 11 लाख टन से अधिक प्रोडक्शन करता है. इसके बाद महाराष्ट्र का स्थान आता है.

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