
आज के दौर में खेती के सामने सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन है. बेमौसम बारिश, भीषण गर्मी और बदलता तापमान फसलों, विशेषकर गेहूं और मक्का की पैदावार पर बुरा असर डाल रहा है. इस संकट को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ एम.एल जाट ने स्पष्ट किया है कि अब पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव की सख्त जरूरत है. ICAR अब ऐसी 'क्लाइमेट रेजिलिएंट' यानी जलवायु सहनशील किस्में विकसित करने पर पूरा जोर दे रहा है, जो न केवल बदलते मौसम की मार झेल सकें, बल्कि किसानों को भरपूर पैदावार भी दें. इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रतिकूल मौसम में भी देश का अन्न भंडार खाली न हो और किसानों की मेहनत बेकार न जाए.
ICAR केवल पैदावार बढ़ाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अब ध्यान फसल की गुणवत्ता पर भी है. महानिदेशक के अनुसार, नई विकसित की जा रही अधिकतर किस्में 'बायो-फोर्टिफाइड' हैं. इसका सरल अर्थ यह है कि इन बीजों से उगने वाली फसलों में आयरन, जिंक और विटामिन जैसे पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से अधिक होंगे. इससे जो उत्पाद तैयार होगा, वह न केवल सेहतमंद (Healthy) होगा, बल्कि कुपोषण जैसी समस्याओं से लड़ने में भी मदद करेगा. जब किसान इन आधुनिक किस्मों को उगाएंगे, तो उन्हें बेहतर उत्पादन के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाला अनाज मिलेगा, जिसकी बाजार में भी भारी मांग रहती है. यह 'क्वालिटी और क्वांटिटी' का एक ऐसा मेल है जो भविष्य की खेती का आधार बनेगा.
ICAR के महानिदेशक के अनुसार, सिर्फ अच्छे बीज होना ही काफी नहीं है, बल्कि किसानों को अब 'स्मार्ट खेती' अपनानी होगी. उन्नत किस्म के बीज तभी भरपूर पैदावार देते हैं जब उनकी बुवाई सही समय और सही तकनीक से की जाए. बदलते मौसम और बढ़ती गर्मी को देखते हुए अब पुरानी 'छिटकवां विधि' को छोड़कर नई मशीनी तकनीकों को अपनाना जरूरी है. हालांकि गेहूं की ऐसी कई किस्में आ गई हैं जो गर्मी सह सकती हैं, लेकिन अगर बुवाई के समय और तरीके का ध्यान नहीं रखा गया, तो जलवायु परिवर्तन, तेज हवाओं और नमी के कारण फसल गिरने का डर रहता है. इसीलिए, नई किस्म के बीजों के साथ-साथ आधुनिक बुवाई तकनीकों के तालमेल से बेहतर पैदावार ले सकते हैं और फसल की गिरने की समस्या से बच सकते हैं.
डॉ जाट ने बताया कि गेहूं के मामले में भारत एक बड़ी उपलब्धि की ओर है. देश के लगभग 60 फीसदी से ज्यादा किसान अब नए जलवायु सहनशील और बायो-फोर्टिफाइड बीजों का उपयोग कर रहे हैं. यदि मौसम का साथ बना रहा, तो इस साल गेहूं की पैदावार रिकॉर्डतोड़ 12 करोड़ टन के पार जा सकती है. यह न केवल किसानों के लिए खुशखबरी है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा बूस्ट है. उन्होंने बताया कि जायद मक्का पर तापमान का बहुत असर होता था, लेकिन ICAR ने कई नई किस्में विकसित की हैं और जिससे तस्वीर पूरी बदल गई है. अब ऐसी किस्में उपलब्ध हैं जो अत्यधिक गर्मी में भी कम प्रभावित होती हैं और अधिक पैदावार देती हैं. यही कारण है कि उत्तर भारत में जायद मक्का का रकबा तेजी से बढ़ रहा है.
आईसीआर के महानिदेशक ने सुझाव दिया है कि किसानों को अपने उत्पाद की क्वालिटी के हिसाब से कीमत मांगनी चाहिए, इससे लाभ में रहेगे. उदाहरण के तौर पर, राजस्थान में तिलहनी फसलों की कीमत उनमें मौजूद तेल की मात्रा यानी ऑयल प्रतिशत के आधार पर तय होती है. इसी तरह, यदि किसान बायो-फोर्टिफाइड और उच्च गुणवत्ता वाला अनाज उगा रहे हैं, तो उन्हें उसका मूल्य भी बेहतर मिलना चाहिए. किसानों को जागरूक होना होगा कि वे केवल 'माल' न बेचें, बल्कि 'क्वालिटी उत्पाद' बेचें. जब किसान अपनी फसल की गुणवत्ता को पहचानेंगे और बाजार में उसकी सही दावेदारी करेंगे, तभी वे खेती को एक घाटे के सौदे से बदलकर एक मुनाफे वाले बिजनेस में तब्दील कर पाएंगे.