
लखनऊ के मलिहाबाद में दशहरी आम की खेती बड़े पैमाने में की जाती है. इसी क्रम में सोमवार को राज्य परिवर्तन आयोग के सीईओ और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह ने (ICAR-CISH) केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान का दौरा किया. इस अवसर पर उन्होंने आम में 'कैनोपी प्रबंधन' (Canopy Management) कार्यशाला का उद्घाटन किया. मनोज कुमार सिंह ने आम के पेड़ों के कैनोपी प्रबंधन के लिए स्पेन से इम्पोर्ट करके लखनऊ पहुंची ट्रैक्टर-माउंटेड ट्री प्रूनर (पेड़ की छंटाई करने वाली मशीन) के प्रदर्शन को देखा. यह मशीन राज्य सरकार के वित्तीय सहयोग से एकीकृत बागवानी विकास मिशन परियोजना के तहत किसानों के बागों में बड़े पैमाने पर आम के पेड़ों के जीर्णोद्धार के लिए खरीदी गई है. यह मशीन पेड़ की ऊंचाई को 40-50 फीट से घटाकर आम की किस्म अनुसार 14-18 फीट तक कर देगी.
अत्याधुनिक छंटाई तकनीक का प्रदर्शन आम के बाग में किसानों से भी बातचीत की,जो पिछले 20 वर्षों से आम के पेड़ों के जीर्णोद्धार के कार्य से जुड़े हुए हैं. इस तकनीक में आम के पेड़ की शाखाओं की 'हेडिंग बैक' (तृतीयक स्तर पर ऊपरी हिस्से की कटाई) बारिश के मौसम के बाद, विशेष रूप से अक्टूबर माह में की जाती है. इसके बाद नई निकलने वाली कोंपलों (new flush) को कीटों और बीमारियों से उचित सुरक्षा प्रदान की जाती है और बाद के वर्षों में, पेड़ की कैनोपी को बनाए रखने के लिए अनावश्यक नई टहनियों की उचित छंटाई की जाती है, और साथ ही पेड़ की ऊंचाई को नियंत्रित रखने के लिए इसी मशीन के द्वारा 'टेबल टॉप प्रूनिंग' की जाती है.
इससे न केवल 'फ्रूट बैगिंग' (फलों को ढकने) जैसे कार्यों की दक्षता बढ़ती है, बल्कि आम की खेती में उपयोग होने वाले पानी, उर्वरक, कीटनाशक आदि जैसे संसाधनों की उपयोग भी बढ़ती है, जिससे खेती की लागत में कमी आती है. यह आम के बागों में अतिरिक्त आय के लिए 'अंतर-फसल' (intercropping) की संभावनाओं को भी खोलता है.
यह तकनीक यह सुनिश्चित करेगी कि अधिक से अधिक क्षेत्र ऐसे बागों के अंतर्गत आए, जो आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए तैयार हैं.
इस मौके पर वैज्ञानिकों और किसानों को संबोधित करते हुए मनोज कुमार सिंह ने बागवानी क्षेत्र के योगदान पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश की कुल कृषि उत्पाद में 30 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है, और राज्य में उपलब्ध अलग-अलग प्रकार की मिट्टी और जलवायु परिस्थितियों के कारण यहां से फलों के निर्यात की अपार संभावनाएं मौजूद हैं.
सिंह ने नवीनतम तकनीकी नवाचारों को तेजी से अपनाने और फल मूल्य श्रृंखला (fruit value chain) में शामिल सभी हितधारकों तथा एजेंसियों को आपस में जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने आम के गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और निर्यात पर स्पष्ट प्रभाव डालने के उद्देश्य से, ट्री प्रूनर, फल तोड़ने वाली मशीनों और अन्य उपकरणों सहित ऐसी और भी मशीनों की खरीद में सहयोग देने का आश्वासन दिया.
उन्होंने आगे इस बात पर भी जोर दिया कि राज्य में अच्छी तकनीकों के प्रभाव को कई गुना बढ़ाने की जिम्मेदारी सरकारी और निजी, दोनों ही एजेंसियों को उठानी होगी. संस्थान में आम प्रोसेसिंग सुविधा के क्षेत्र में हुई नई प्रगति के बारे में निदेशक डॉ. टी. दामोदरन द्वारा जानकारी दिए जाने पर, उन्होंने सुझाव दिया कि प्रसंस्कृत उत्पाद और पेय पदार्थ विकसित करने के लिए आम के पल्प (गूदे) के आयात से जुड़ी एजेंसियों के साथ तालमेल बिठाया जाए.
वहीं, फलों की थैलाबंदी करने वाले बैग बनाने के लिए कागज़ के आयात का मुद्दा मेटा एग्रो प्राइवेट लिमिटेड के मयंक सिंह द्वारा उठाए जाने के जवाब में, मनोज कुमार सिंह ने आश्वासन दिया कि फल बैग के लिए स्वदेशी कागज के उत्पादन के लिए कागज़ उद्योगों के माध्यम से हर संभव सहायता प्रदान की जाएगी.
सीआईएसएच के निदेशक डॉ. टी. दामोदरन ने आम के जीर्णोद्धार तकनीक के बारे में विस्तार से जानकारी दी, और इसके ऐतिहासिक संदर्भ तथा वर्तमान स्थिति से अवगत कराया. इस तकनीक के विकास से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा पुनर्जीवन प्रक्रिया, देखभाल, पोषक तत्व, जल और कीट प्रबंधन से संबंधित विस्तृत प्रस्तुतियां दी गईं.
ये भी पढ़ें-
आंधी‑बारिश का अलर्ट: यूपी को मिल सकती है लू से राहत, गुजरात में गर्मी का कहर जारी