
महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित लातूर जिले में चारे का संकट बढ़ता जा रहा है. बारिश कम होने से खेतों और चरागाहों में हरा चारा खत्म हो गया है. ऐसे में किसान अपने मवेशियों का पेट भरने के लिए खड़ी गन्ने की फसल काटने को मजबूर हैं. इससे किसानों को एक तरफ मवेशियों के लिए चारा मिल रहा है, तो दूसरी तरफ उनकी नकदी फसल का नुकसान हो रहा है. साथ ही महाराष्ट्र के ही नांदेड़ जिले में पशुओं के लिए चारा नहीं मिलने की वजह से किसान अपनी पशुओं को औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर हैं.
लातूर के कव्हा गांव के किसान नारायण गुडे करीब 7 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं. उनके पास 7 भैंसें, 2 गाय और कई बछड़े हैं. किसान गुडे का कहना है कि बारिश नहीं होने की वजह से इलाके में चारा बिल्कुल नहीं बचा है, इसलिए उनके पास मवेशियों को खिलाने के लिए गन्ने की खड़ी फसल काटने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है. उन्होंने बताया कि उनके मवेशियों के लिए हर दिन करीब आधा टन गन्ने की जरूरत पड़ती है. चारे की कमी का असर दूध उत्पादन पर भी पड़ा है. पहले के मुकाबले अब उनके मवेशियों से रोजाना सिर्फ 10 से 12 लीटर दूध मिल रहा है.
सूखे का असर सिर्फ चारे पर ही नहीं पड़ा है. किसानों की दूसरी फसलें भी प्रभावित हुई हैं. किसान नारायण गुडे ने बताया कि उनकी सोयाबीन की फसल को भारी नुकसान हुआ है. अब प्रति एकड़ आधा क्विंटल से भी कम उत्पादन होने की उम्मीद है. किसान अब गन्ने के साथ सोयाबीन के बचे हुए अवशेष को मिलाकर मवेशियों को चारे के तौर पर खिला रहे हैं. किसानों का कहना है कि अगर जल्द बारिश नहीं हुई और चारे की व्यवस्था नहीं की गई, तो पशुओं को पालना भी मुश्किल हो जाएगा.
लातूर समेत मराठवाड़ा के कई इलाकों में पशुपालन किसानों की आय का महत्वपूर्ण जरिया है. खेती खराब होने पर दूध से मिलने वाली रोजाना की आमदनी किसानों को सहारा देती है, लेकिन चारे और पानी की कमी के कारण दूध उत्पादन घट रहा है, जिससे किसानों की परेशानी और बढ़ गई है. महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के 358 तालुकों में से 284 में सूखा घोषित किया है. सरकार ने प्रभावित इलाकों के लिए फसल लोन के पुनर्गठन, भूमि राजस्व में छूट और बिजली बिल में सब्सिडी जैसे राहत उपायों की घोषणा की है. वहीं, लातूर के किसान तत्काल सरकारी चारा शिविर शुरू करने की मांग कर रहे हैं, ताकि मवेशियों को बचाया जा सके और किसानों पर बढ़ते आर्थिक बोझ को कम किया जा सके. (PTI)