केसर की खेतीलद्दाख में अब सेब, जौ और दूसरी पारंपरिक फसलों के साथ केसर की खेती को भी बढ़ावा देने की तैयारी है. केंद्र शासित प्रदेश में पहली बार बड़े पैमाने पर केसर की खेती का प्रयोग शुरू किया गया है. इसके तहत लेह के स्पितुक फड़का में पहले बंजर पड़ी जमीन को खेती के लिए तैयार किया गया और अब वहां करीब 90 हजार प्रीमियम ईरानी केसर के कॉर्म्स लगाए गए हैं. इस प्रयोग का मकसद लद्दाख के ऊंचाई वाले इलाकों में केसर की खेती की संभावनाओं को तलाशना और किसानों के लिए कमाई के नए रास्ते तैयार करना है.
लद्दाख के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर इस पहल की जानकारी साझा की. उन्होंने बताया कि लद्दाख में पहली बार बड़े पैमाने पर केसर की खेती शुरू करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण प्रयोग किया जा रहा है. इसके लिए लेह के स्पितुक फड़का में करीब 4,000 वर्ग मीटर जमीन को चुना गया है. खास बात यह है कि जिस जमीन पर केसर की खेती शुरू की गई है, वह पहले बंजर थी. यानी वहां सामान्य तौर पर खेती नहीं हो रही थी. 'प्रोजेक्ट हिम सरोवर' के तहत इस जमीन को दोबारा उपजाऊ बनाया गया और खेती के लिए तैयार किया गया. अब इसी जमीन पर केसर के कॉर्म्स लगाए गए हैं.
इस प्रयोग के तहत करीब 800 किलोग्राम वजन वाले 90,000 प्रीमियम ईरानी केसर के कॉर्म्स लगाए गए हैं. कॉर्म्स को आम भाषा में केसर के बल्ब या बीज के तौर पर समझा जा सकता है. इन कॉर्म्स को लद्दाख की ऊंचाई और वहां की कृषि-जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए चुना गया है. लद्दाख का ज्यादातर इलाका काफी ऊंचाई पर स्थित है और यहां की जलवायु देश के मैदानी और अन्य कृषि क्षेत्रों से अलग है. ऐसे में किसी नई फसल को बड़े स्तर पर शुरू करने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह स्थानीय मौसम और मिट्टी की परिस्थितियों में कितनी अच्छी तरह विकसित हो पाती है. केसर की खेती का यह प्रयोग इसी दिशा में एक कदम माना जा रहा है.
उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने इस पहल को कृषि में विविधता लाने के प्रयास से जोड़ा है. कृषि विविधीकरण का मतलब है कि किसान केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भर न रहें, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से दूसरी संभावित और अधिक मूल्य वाली फसलों को भी अपनाएं. इस पहल का एक उद्देश्य किसानों की आर्थिक स्थिरता और उन्हें सशक्त बनाना भी है. अगर केसर की खेती का प्रयोग सफल होता है और आगे इसे बड़े क्षेत्र में अपनाया जाता है, तो इससे किसानों को अतिरिक्त आय का जरिया मिल सकता है.
इस परियोजना का फायदा केवल किसानों तक सीमित रखने की योजना नहीं है. इसके जरिए स्थानीय युवाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए भी रोजगार और आजीविका के नए अवसर पैदा करने की संभावना जताई गई है. केसर की खेती के साथ इसकी देखभाल, फूलों की तुड़ाई, केसर के रेशों को अलग करना, सुखाना, पैकेजिंग और बाजार तक पहुंचाने जैसे कामों में भी स्थानीय स्तर पर लोगों की जरूरत पड़ सकती है. इससे खेती से जुड़े छोटे स्तर के कारोबार को भी बढ़ावा मिल सकता है.
लद्दाख जैसे पहाड़ी और ऊंचाई वाले क्षेत्र में खेती के लिए जमीन सीमित है. ऐसे में पहले से बंजर पड़ी जमीन को खेती योग्य बनाकर उसका इस्तेमाल करना महत्वपूर्ण हो सकता है. प्रोजेक्ट हिम सरोवर के तहत तैयार की गई जमीन पर केसर की खेती शुरू होना इसी दिशा में एक प्रयोग है. फिलहाल यह एक प्रयोगात्मक परियोजना है. आने वाले समय में फसल का उत्पादन, गुणवत्ता और लद्दाख की जलवायु के साथ इसका अनुकूलन किस तरह रहता है, इसके आधार पर आगे की संभावनाएं तय होंगी. (PTI)
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