
कश्मीर में सेब उगाने वाले किसान गंभीर मुसीबत में हैं. उनकी बागवानी पर खराब मौसम की गंभीर मार पड़ रही है. अल नीनो ने इसे और भी खतरनाक बना दिया है क्योंकि बारिश गायब है और गर्मी भयंकर रूप से बढ़ रही है. साथ में ओलावृष्टि ने भी मुश्किलें बढ़ा दी हैं. हाल के दिनों की बात करें तो 18 जून को दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के ऊपरी इलाके में सेब उगाने वाले कई गांवों में जबरदस्त ओलावृष्टि हुई. इससे एक दिन पहले, पड़ोसी शोपियां जिले के कई गांवों में भी ओले गिरे थे. यह इलाका अपनी बेहतरीन क्वालिटी के सेबों के लिए जाना जाता है.
इस महीने में यह तीसरी बार था जब दक्षिण कश्मीर में सेब के बागों पर ओले गिरे, जिससे पहले से ही मौसम की अनिश्चितता से जूझ रहे किसानों की मुश्किलें और बढ़ गईं.
शोपियां के कीगम के सेब किसान रईस अहमद ने 'बिजनेसलाइन' से कहा, "मार्बल के आकार के ओलों ने सेब की सतह पर निशान डाल दिए." उन्होंने बताया कि कुछ ही मिनटों में अच्छी फसल की उनकी सारी उम्मीदें टूट गईं.
अहमद ने पहली बार इतनी भयानक ओलावृष्टि देखी थी, जो उनके इलाके में कम से कम 20 मिनट तक चली.
श्रीनगर में भारत मौसम विज्ञान विभाग के अधिकारियों ने बताया कि पिछले महीने इस इलाके में ओलावृष्टि की लगभग छह से सात घटनाएं दर्ज की गईं. अधिकारियों ने कहा, "पूरी घाटी से ओलावृष्टि की खबरें मिली हैं."
सेब और चेरी उगाने वाले किसान और फ्रूट मास्टर एग्रो फ्रेश प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ इजहान जावेद ने कहा कि बागवानी पर जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से दिख रहा है.
उन्होंने कहा, "इस सीजन में हमने ओलावृष्टि की छह से आठ घटनाएं देखी हैं, जो पहले कभी नहीं हुआ."
कश्मीर यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर मोहम्मद अनीस ने भी जम्मू-कश्मीर में मौसम की चरम घटनाओं के बार-बार होने की बात मानी. उन्होंने कहा, "जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के अजीब पैटर्न से खड़ी फसलों को लगातार नुकसान हो रहा है."
ओलावृष्टि की बार-बार होने वाली घटनाओं ने पूरी घाटी में सेब के बागों को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे फलों की फसलों को भारी नुकसान हुआ है. जावेद ने कहा, "नुकसान का सही अंदाजा तो नहीं है, लेकिन बार-बार होने वाली ओलावृष्टि का असर काफी ज्यादा है." उन्होंने नुकसान का अंदाजा 70 से 80 प्रतिशत लगाया.
फसल बीमा योजना न होने के कारण, किसान जलवायु परिवर्तन के तनाव से निपटने के लिए 'हाई-डेंसिटी' (घने) बागों को एक बेहतर उपाय के तौर पर देख रहे हैं.
किसानों के अनुसार, ऐसे बागों को ओला रोकने वाली जाली (एंटी-हेल नेट) लगाकर बचाया जा सकता है. किसानों के एक समूह ने कहा, "हालांकि, पारंपरिक बागों में, जहां पेड़ बहुत बड़े होते हैं, ऐसी जालियां शायद काम न आएं." उन्होंने कहा कि मौसम से जुड़े बढ़ते खतरों से बागवानी को बचाने के लिए, सुरक्षात्मक ढांचे (जैसे ओलों से बचाने वाली जालियां) पर सब्सिडी के रूप में सरकारी मदद बहुत जरूरी है.