
भारत सरकार पिछले कुछ समय से देश को खाने के तेल के मामले में 'आत्मनिर्भर' बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है. सरकार का पूरा जोर तिलहनी फसलों की पैदावार बढ़ाने पर है, लेकिन इस साल जून के महीने में मॉनसून की बेरुखी और सूखे जैसे हालात ने इस मुहिम को शुरुआती दौर में ही एक बड़ा झटका दे दिया है. खरीफ सीजन की दो सबसे मुख्य फसलें सोयाबीन और मूंगफलीशुरुआत में ही गहरे संकट में घिर गई हैं. कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, सोयाबीन की बुवाई के लिए जून का महीना और जुलाई का पहला हफ्ता सबसे बेहतर माना जाता है, मगर इस बार ऐन वक्त पर आसमान से राहत की बूंदें नहीं बरसीं.अगर 15 जुलाई तक इन प्रमुख उत्पादक राज्यों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो खेती का रकबा काफी घट सकता है. इसका सीधा असर देश के घरेलू उत्पादन पर पड़ेगा, जिससे सरकार की मुश्किलें बढ़ेंगी और मजबूरन विदेशी तेल का इंपोर्ट बढ़ाना पड़ सकता है,जो आम आदमी के बजट को पूरी तरह बिगाड़ देगा.
मौसम विभाग (IMD) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश के प्रमुख सोयाबीन और मूंगफली उत्पादक राज्यों में जून के महीने में मॉनसून की भयंकर बेरुखी देखने को मिली है. मध्य प्रदेश में पूरे महीने सामान्य 131.1 मिमी के मुकाबले सिर्फ 87.8 मिमी बारिश हुई, जो कि 33% की बड़ी कमी को दिखाता है. महाराष्ट्र का हाल भी जुदा नहीं रहा, जहाँ 209.8 मिमी की नॉर्मल बारिश के सामने महज 110.6 मिमी पानी ही गिरा और किसानों को 47% की भारी किल्लत से जूझना पड़ा. मूंगफली के सबसे बड़े उत्पादक सूबे गुजरात की स्थिति तो और भी ज्यादा नाजुक रही, जहाँ 110.8 मिमी की सामान्य बारिश की तुलना में सिर्फ 20.5 मिमी मामूली बूंदें ही बरस सकीं, जिसके चलते वहाँ करीब 82% की रिकॉर्डतोड़ सूखे जैसी मार पड़ी है. इस भीषण सूखे झटके ने खरीफ की शुरुआती खेती का पूरा गणित ही बिगाड़ कर रख दिया है.
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 29 जून 2026 तक के ताजातरीन और संशोधित आंकड़ों के मुताबिक, इस मानसूनी बेरुखी का सबसे जानलेवा असर फसलों की बोनी के रकबे पर पड़ा है, जिसमें सबसे बड़ा घाटा सोयाबीन की फसल को झेलना पड़ा है. पिछले साल के 19.97 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस साल सोयाबीन का रकबा घटकर सिर्फ 6.92 लाख हेक्टेयर पर बुवाई हो पाई है, यानी इसमें करीब 13.05 लाख हेक्टेयर लगभग 65.35% की भारी गिरावट दर्ज की गई है. इसी तर्ज पर, मूंगफली की बुवाई का इलाका भी पिछले साल के 15.29 लाख हेक्टेयर से घटकर जून में 8.87 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो कि सीधे तौर पर करीब 41.98% का बड़ा नुकसान दिखाता है. तिलहनी फसलों का इस कदर पिछड़ जाना देश को खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की सरकारी साख और घरेलू कीमतों के लिए एक बड़ा अलार्म है; अगर जुलाई के शुरुआती पखवाड़े में बादलों ने राहत की झड़ी नहीं लगाई, तो यह कृषि संकट और भी ज्यादा गहरा सकता है.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद - राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर की ताजा गाइडलाइन और साप्ताहिक सलाह के मुताबिक, सोयाबीन की बुवाई को लेकर किसानों को खास हिदायत दी गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को केवल कैलेंडर की तारीख देखकर सोयाबीन की बोनी शुरू नहीं कर देनी चाहिए. संस्थान के मुताबिक, सोयाबीन की बुवाई तभी की जानी चाहिए जब क्षेत्र में मॉनसून का बाकायदा आगमन हो जाए और कम से कम 100 मिमी की अच्छी बारिश दर्ज हो चुकी हो. इससे जमीन के भीतर पर्याप्त नमी जमा हो जाती है, जो बीज के सही अंकुरण के लिए बेहद जरूरी है. कम बारिश या सूखी जमीन में जल्दबाजी में की गई बुवाई से बीज खराब होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है, जिससे किसानों की पूरी लागत डूब सकती है और दोबारा बोनी करने की नौबत आ सकती है.
इस साल 'अल नीनो' के असर के चलते सूखे की जो आशंका जताई जा रही है, उससे निपटने के लिए सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने किसानों को बेहद जरूरी और व्यावहारिक मशविरा दिया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस बड़े रिस्क को कम करने के लिए किसानों को किसी एक वैरायटी पर निर्भर रहने के बजाय कम और मध्यम समय में पककर तैयार होने वाली कम से कम दो अलग-अलग किस्मों के बीजों का चयन करना चाहिए. इसके अलावा, खेती की आधुनिक और नमी बचाने वाली तकनीकों का इस्तेमाल बेहद जरूरी हो गया है.
किसानों को सलाह दी गई है कि वे पारंपरिक तरीके के बजाय 'ब्रॉड बेड फरो' रिज एंड फरो' या 'रेज्ड बेड' जैसी बोनी मशीनों को तरजीह दें, जो कम बारिश में भी जमीन की नमी को लंबे समय तक बरकरार रखती हैं और भारी बारिश होने पर जलभराव से फसल को बचाती हैं. मौजूदा नाजुक सूरतेहाल को देखते हुए किसानों के लिए आने वाले कुछ दिन बेहद कीमती हैं, इसलिए वे मौसम के मिजाज पर नजर बनाए रखें और घबराकर कम नमी में बुवाई करने की गलती कतई न करें.