सूखे की चपेट में जालना का ‘ग्रेप हब’, बारिश नहीं होने से अंगूर के बागों पर संकट; किसानों की बढ़ी चिंता

सूखे की चपेट में जालना का ‘ग्रेप हब’, बारिश नहीं होने से अंगूर के बागों पर संकट; किसानों की बढ़ी चिंता

महाराष्ट्र के जालना जिले का कडवंची गांव, जिसे ‘अंगूर का हब’ और ‘अंगूरों की नगरी’ कहा जाता है, इस साल सूखे की मार झेल रहा है. बारिश की कमी से कुएं और खेत तालाब सूखने लगे हैं, जिससे करीब 1300-1400 एकड़ में फैले अंगूर के बागों पर संकट मंडरा रहा है.

अंगूर के बागों पर संकटअंगूर के बागों पर संकट
गौरव विजय साळी
  • Jalna,
  • Oct 05, 2026,
  • Updated Oct 05, 2026, 9:52 AM IST

महाराष्ट्र के जालना जिले का 'द्राक्ष हब' (अंगूर का हब) और 'द्राक्षों की पंढरी' (अंगूरों की नगरी) के नाम से पहचाने जाने वाला कडवंची गांव इस साल सूखे की मार झेल रहा है. पर्याप्त बारिश नहीं होने की वजह से कडवंची इलाके की अंगूर के बाग संकट में आ गए हैं. किसानों ने अंगूर के बागों पर लाखों रुपये खर्च किए हैं, लेकिन अब कुओं और खेत तालाबों में पानी कम होने से बागों को बचाना मुश्किल हो रहा है. किसानों के मुताबिक, अगर अगले कुछ दिनों में बारिश नहीं हुई तो बड़ी संख्या में अंगूर के बाग सूख सकते हैं.

बारिश की कमी से अंगूर के बागों पर संकट

जालना तालुका का कडवंची गांव अंगूर उत्पादन के लिए अपनी अलग पहचान रखने वाला इलाका है, लेकिन इस साल यही अंगूरों की नगरी पानी के संकट से जूझ रही है. कडवंची गांव में करीब 1300 से 1400 एकड़ क्षेत्र में अंगूर के बाग हैं. गांव के ज्यादातर किसान अंगूर की खेती पर निर्भर हैं. यहां की अंगूर खरीदने के लिए महाराष्ट्र के साथ-साथ छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात से भी व्यापारी आते हैं. लेकिन इस साल बारिश पर्याप्त नहीं होने की वजह से हालात बदल गए हैं. बारिश नहीं होने से खेत तालाब पूरी तरह नहीं भर पाए हैं, जबकि कई कुओं ने भी तलहटी पकड़ ली है. ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि अंगूर के बागों को पानी कहां से दें?

इस समय अंगूर के बागों की छंटाई का सीजन शुरू हो गया है. किसानों ने बागों पर पहले ही लाखों रुपये खर्च किए हैं. लेकिन पानी की कमी के कारण कई किसान छंटाई करने से भी पीछे हट रहे हैं. किसानों का कहना है कि पिछले साल बेमौसम बारिश के कारण फसल को नुकसान हुआ था. इस साल बारिश की कमी ने नई परेशानी खड़ी कर दी है. यानी एक साल बारिश ज्यादा होने से नुकसान और अब बारिश कम होने से अंगूर के बागों पर संकट.

पानी की कमी से आमदनी पर संकट

किसान कृष्णा क्षीरसागर बताते हैं कि, उन्होंने 2001 में दो एकड़ में अंगूर के बाग लगाए थे. धीरे-धीरे बाग बढ़ाते हुए आज 17 एकड़ में अंगूर की खेती है. लेकिन इस साल बारिश अच्छी नहीं हुई, नदी में पानी नहीं आया और खेत तालाब भी नहीं भर पाए. अभी तालाब में करीब एक महीने का ही पानी बचा है. अब सवाल है कि अंगूर के बाग को कैसे बचाएं? बाग पर करीब 60 प्रतिशत खर्च हो चुका है. बाकी 40 प्रतिशत खर्च करके उत्पादन लेने का समय आया है, लेकिन पानी नहीं है. अगर 10 से 15 दिन में बारिश होती है तो छंटाई करके फसल ली जा सकती है.

सरकार अंगूर उत्पादक किसानों को मदद दे और पानी की समस्या के लिए नदी जोड़ परियोजना के जरिए स्थायी समाधान करें. किसान कृष्णा क्षीरसागर के मुताबिक, उनकी 17 एकड़ अंगूर के बाग पर अब तक करीब 10 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं. इस बाग से 60 से 65 लाख रुपये तक की आमदनी की उम्मीद थी. लेकिन पानी की कमी के कारण अब यह आमदनी घटकर करीब 10 लाख रुपये तक रह जाने का अंदाजा है. कृष्णा क्षीरसागर का कहना है कि कडवंची से करीब 18 किलोमीटर की दूरी पर खडकपूर्णा धरण है. अगर वहां से पानी उपलब्ध कराया जाता है तो खेती के साथ-साथ गांव के लोगों और पशुओं के पीने के पानी की समस्या भी दूर हो सकती है.

पानी की कमी से 40-45 लाख की उम्मीद पर संकट

सिर्फ कृष्णा क्षीरसागर ही नहीं, बल्कि कडवंची के दूसरे अंगूर उत्पादक किसान भी इसी समस्या से परेशान हैं. किसान उद्धव क्षीरसागर ने बताया कि, उनके पास 10 एकड़ में अंगूर के बाग हैं. इस बाग पर करीब चार से साढ़े चार लाख रुपये खर्च हुए हैं. इस साल बारिश अच्छी नहीं हुई, इसलिए तालाब भी नहीं भर पाए और कुएं में भी पानी नहीं है. अभी करीब एक महीने का पानी बचा है. इसके बाद पानी खत्म हो गया तो बाग को बचाना मुश्किल होगा. उन्हें 40 से 45 लाख रुपये की आमदनी की उम्मीद थी, लेकिन अब बाग पर हुआ खर्च भी निकलना मुश्किल है.

सरकार किसानों की मदद करे, ऐसी मांग उद्धव क्षीरसागर ने की है. खडकपूर्णा धरण से पानी या नदी जोड़ परियोजना के जरिए पानी मिल जाए तो अंगूर के बागों को बचाया जा सकता है. उद्धव क्षीरसागर के मुताबिक, एक एकड़ अंगूर के बाग पर करीब दो से ढाई लाख रुपये तक खर्च आता है. 10 एकड़ से करीब 40 से 45 लाख रुपये की आमदनी की उम्मीद रहती है. लेकिन इस बार पानी की कमी ने पूरी गणित बिगाड़ दी है. किसानों का कहना है कि अगर सूखे की स्थिति ऐसी ही बनी रही तो आने वाले दिनों में कडवंची इलाके की अंगूर के बागों पर इसका गंभीर असर दिखाई दे सकता है.

90 फीसदी अंगूर के बागों पर संकट

वहीं, पानी की कमी का असर अब सीधे अंगूर के बागों पर दिखाई देने लगा है. कडवंची के किसान सुनील जोशी ने तो अपनी पांच एकड़ की अंगूर के बाग में से दो एकड़ की बाग पानी के अभाव में निकाल दी है. किसान सुनील जोशी बताते हैं कि, उनके पास पांच एकड़ में अंगूर के बाग थे. पानी नहीं होने के कारण दो एकड़ की बाग निकालनी पड़ी. कुएं में पानी नहीं है और तालाब में भी करीब एक महीने का पानी बचा है. पांच एकड़ की बाग पर करीब साढ़े छह लाख रुपये खर्च हुए थे. इससे 20 से 22 लाख रुपये की आमदनी की उम्मीद थी. लेकिन अब खर्च निकालना भी मुश्किल लग रहा है. अगर बारिश नहीं हुई तो कडवंची इलाके की करीब 90 प्रतिशत अंगूर के बाग प्रभावित हो सकते हैं. खडकपूर्णा धरण से पानी दिया जाए तो हमारी समस्या दूर हो सकती है. सरकार किसानों की मदद करें.

सरकार से सिंचाई व्यवस्था कराने की मांग

किसानों के मुताबिक, कडवंची इलाके में अंगूर की खेती लंबे समय से की जा रही है. कई किसानों ने अपनी पूरी खेती को अंगूर उत्पादन के लिए विकसित किया है. इसके लिए कुएं, खेत तालाब और सिंचाई की दूसरी व्यवस्थाएं भी खड़ी की गई हैं. लेकिन इस बार बारिश कम होने के कारण यही जलस्रोत अब किसानों के लिए चिंता का कारण बन गए हैं. अंगूर के बाग में एक बार खर्च शुरू होने के बाद किसान को लगातार पानी, दवा, मजदूरी और अन्य कृषि कार्यों पर खर्च करना पड़ता है. ऐसे में बीच में पानी की कमी होने पर पहले किया गया खर्च भी डूबने का खतरा किसानों के सामने है. किसानों की मांग है कि सरकार अंगूर उत्पादक किसानों को आर्थिक सहायता दे और कडवंची इलाके की पानी की समस्या का स्थायी समाधान निकाले.

कडवंची से करीब 18 से 20 किलोमीटर की दूरी पर खडकपूर्णा धरण होने का हवाला देते हुए किसान यहां से पानी उपलब्ध कराने की मांग कर रहे हैं. किसानों का कहना है कि अगर इस क्षेत्र में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जाए, तो अंगूर के बागों को बचाया जा सकता है. फिलहाल कडवंची की अंगूर के बागों को बचाने के लिए किसानों की नजरें आसमान पर टिकी हैं... बारिश हुई तो बागें बच सकती हैं... लेकिन अगर बारिश नहीं हुई, तो लाखों रुपये खर्च करके खड़ी की गई अंगूर के बागों के सूखने का खतरा बढ़ जाएगा.

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