भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) ने व्यावसायिक खेती के लिए देश की पहली गैर-जीएम शाकनाशी सहिष्णु बासमती चावल की किस्में विकसित की हैं. ये नई किस्में खरपतवारों को रोकने में कारगर सबाति होंगी. कहा जा रहा है कि इन किस्मों की खेती में पानी का दोहन भी कम होगा, क्योंकि सिंचाई की कम जरूरत पड़ती है. साथ ही मीथेन उत्सर्जन की चुनौतियों का समाधान करने में भी मदद करेंगी.
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 'रॉबीनोवीड' कहलाने वाली ये दो किस्में - पूसा बासमती 1979 और पूसा बासमती 1985 हैं. दोनों किस्मों को आईसीएआर-आईएआरआई द्वारा विकसित किया गया है. दोनों किस्में उन किसानों के लिए फायदेमंद होंगी जो धान की सीधी बुवाई करते हैं. साथ ही जहां खरपतवार एक बड़ी समस्या है, वहां के लिए यह कारगर साबित होगा. आईएआरआई के निदेशक, एके सिंह ने कहा कि ये दो नई किस्में खरपतवार की समस्या को काफी प्रभावी ढंग से निपटारा करेंगी. उनकी माने तो पूसा बासमती 1979 और पूसा बासमती 1985 की सीधी बुवाई करने पर लगभग 33 प्रतिशत पानी की बचत होगी.
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दरअसल, गिरता भूजलस्तर उत्तर-पश्चिम भारत में एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है. लेकिन डीएसआर विधि इन दोनों किस्मों की बुवाई करने पर कम श्रम शक्ति की जरूरत पड़ेगी. इसके अलावा ये किस्में मीथेन उत्सर्जन से भी निपट सकती हैं. यानी इससे पर्यावरण को भी फायदा होगा. सिंह ने कहा कि यह टिकाऊ कृषि प्रथाओं और कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के समग्र कल्याण में महत्वपूर्ण योगदान देने की उनकी (नई किस्मों) क्षमता को रेखांकित करता है.
वर्तमान में, IARI की विभिन्न बासमती चावल की किस्मों की देश के कुल बासमती निर्यात में 95 फीसदी हिस्सेदारी है, जो कि 51,000 करोड़ रुपये है. नई किस्में समग्र उत्पादन और निर्यात में इसकी हिस्सेदारी को और बढ़ाएंगी. बीजों की नई किस्मों के व्यावसायिक विमोचन के अवसर पर, हरियाणा के एक किसान, प्रीतम सिंह ने डीएसआर खेती पद्धति का अभ्यास करने का अपना अनुभव साझा किया और आशा व्यक्त की कि नई जड़ी-बूटी सहिष्णु बासमती चावल की किस्में इसे बनाने में काफी मदद करेंगी.
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