
इस साल अल नीनो के संभावित प्रभाव को देखते हुए सोयाबीन उत्पादक किसानों के लिए विशेष कृषि सलाह जारी की गई है. विशेषज्ञों ने किसानों से अपील की है कि वे सोयाबीन की किस्मों का चयन करते समय जल्दी पकने वाली या मध्यम अवधि की किस्मों को प्राथमिकता दें, ताकि सूखे और कीट-रोग के जोखिम को कम किया जा सके.
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो के चलते बारिश में कमी और अनियमित मौसम की आशंका रहती है, जिससे फसल उत्पादकता प्रभावित हो सकती है. ऐसे में किसानों को एक से अधिक किस्मों की बुवाई करने की सलाह दी गई है, ताकि किसी एक किस्म के प्रभावित होने पर दूसरी से उत्पादन बना रहे.
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र जैसे इलाकों, जहां किसान साल में तीन फसलें लेते हैं (जैसे सोयाबीन के बाद आलू, लहसुन या प्याज और फिर गेहूं या चना), वहां किसानों को कम अवधि वाली सोयाबीन किस्में अपनाने की सलाह दी गई है. वहीं, जिन क्षेत्रों में सोयाबीन के बाद केवल एक ही फसल ली जाती है, वहां मध्यम अवधि की किस्मों की बुवाई अधिक लाभदायक रहेगा.
किसानों को यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया है कि वे बीज की उपलब्धता पहले से सुनिश्चित करें और बुवाई से पहले उसकी क्वालिटी जांच लें. इसके लिए कम से कम 70 प्रतिशत अंकुरण क्षमता अनिवार्य बताई गई है. इसके अलावा, उर्वरक, खरपतवारनाशी, फफूंदनाशी और बीज उपचार के लिए आवश्यक रसायनों की व्यवस्था पहले से करने पर जोर दिया गया है.
विशेषज्ञों ने बताया कि सोयाबीन की बुवाई का उपयुक्त समय जून के दूसरे सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक है. हालांकि, बुवाई मॉनसून आने और लगभग 100 मिमी बारिश होने के बाद ही करनी चाहिए, ताकि अंकुरण और शुरुआती वृद्धि बेहतर हो सके.
किसानों के लिए क्षेत्रवार किस्मों का भी सुझाव दिया गया है. मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के लिए JS, NRC और MAUS सीरीज की कई उन्नत किस्में उपयुक्त बताई गई हैं. वहीं पंजाब, हरियाणा, यूपी और उत्तराखंड के किसानों के लिए पूसा और पंत श्रृंखला की किस्में सिफारिश की गई हैं. पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए भी क्षेत्र अनुसार विशेष किस्मों की सूची जारी की गई है.
खेती की तकनीक पर जोर देते हुए वैज्ञानिकों ने हर तीन साल में एक बार गहरी जुताई करने की सलाह दी है, जिससे मिट्टी की उर्वरता और उत्पादन स्थिर बना रहता है. इसके बाद क्रिस-क्रॉस हैरोइंग और पाटी चलाने से खेत तैयार करने की सिफारिश की गई है. साथ ही, 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद या 2.5 टन प्रति हेक्टेयर पोल्ट्री खाद देने की सलाह दी गई है.
बदलते मौसम को देखते हुए किसानों को ब्रॉड बेड फरो (BBF) या रिज और फरो पद्धति अपनाने की सलाह भी दी गई है. इससे जलभराव और सूखे दोनों परिस्थितियों में फसल को बचाया जा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में सूखा, अत्यधिक बारिश और अनियमित बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं. ऐसे में वैज्ञानिक तरीके अपनाकर ही किसान अपनी फसल और आय को सुरक्षित रख सकते हैं.
सेंट्रल जोन (मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र का उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र)
JS 24-33, NRC 150, JS 21-72, NRC 142, JS 23-03, JS 23-09, MAUS 731, गुजरात सोया 4, JS 22-12, JS 22-16, NRC 165, NRC 157, MAUS 725 (महाराष्ट्र), फुले दुर्वा (KDS 992 महाराष्ट्र), RVSM 2011-35, AMS 100-39 (PDKV अंबा), MACS 1520, RSC 10-46, RSC 10-52, AMS-MB-5-18 (सुवर्ण सोया), गुजरात सोयाबीन-4, सोरठ सोनाली (गुजरात), MAUS 725, फुले दुर्वा (KDS 992), MAUS 731 (मराठवाड़ा)
पूर्वी जोन: (छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल और उत्तरी पहाड़ी जोन: असम, मेघालय, मणिपुर, नागालैंड और सिक्किम)
RSC 11-35, RSC 10-71, RSC 10-52, बिरसा सोया-4 (झारखंड), MACS 1407, MACS 1460, NRC 128, RSC 11-07 और RSC 10-46
उत्तरी मैदानी जोन: (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश के उत्तर-पूर्वी मैदान, उत्तराखंड के मैदान और पूर्वी बिहार)
पूसा सोयाबीन 21, NRC 149, पंत सोयाबीन 27, PS 1670, SL 1074, SL 1028, NRC 128, उत्तराखंड ब्लैक सोयाबीन (भट 202-उत्तराखंड) SL 979, SL 955, पंत सोयाबीन 26 (PS 1572), PS 1368, PS 24 (PS 1477), VLS 89
उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र
शालीमार सोयाबीन-3 (SKAU-S-3), हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड का पहाड़ी क्षेत्र NRC 197, VLS 99, हिम पालम सोया-1 (हिमाचल प्रदेश), पंत सोयाबीन 25 (PS 1556), शालीमार सोयाबीन-1 (J&K)
दक्षिणी क्षेत्र (कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र का दक्षिणी हिस्सा)
ALSB 50 (तेलंगाना), MAUS 725 (महाराष्ट्र), फुले दुर्वा (KDS 992 (महाराष्ट्र) NRCMACS 1667, NRC 142, MACS 1460, NRC 132, DSb 34, KDS 753 (फुले किमया), KBS 23 (कर्नाटक)