
बिहार के किसानों के लिए एक बड़ी खुशखबरी है. लीची की फसल पकने के बाद सही प्रबंधन और रख-रखाव की कमी के कारण अक्सर 30 से 40% फल खराब हो जाते थे. लीची ऐसी नाजुक फसल है जो तुड़ाई के महज 1 से 2 दिन के भीतर खराब होने लगती थी, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता था. साथ ही, लंबे समय तक ताजा रखने के लिए रसायनों के अधिक छिड़काव से फल सेहत के लिए भी हानिकारक हो जाते थे. लेकिन अब एक एग्री-टेक स्टार्टअप 'सुपरप्लम' ने इस समस्या के समाधान के लिए एक बेहतरीन पहल की है, जिससे न केवल लीची खराब होने से बचेगी, बल्कि किसानों को बेहतर दाम और उपभोक्ताओं को सुरक्षित और हेल्दी फल भी मिलेगा.
भारत की सबसे उन्नत फल वितरण कंपनी 'सुपरप्लम' इस साल बिहार से लीची की खरीद को पिछले साल के मुकाबले दोगुना करने जा रही है. कंपनी अब भारत की सबसे बड़ी संगठित लीची खरीदार बन गई है. अब किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए बिचौलियों या दलालों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, क्योंकि कंपनी सीधे बगीचे से उपज खरीद रही है. इस सीधी साझेदारी से खेत से लेकर ग्राहकों की थाली तक एक पारदर्शी सप्लाई चेन तैयार हुई है, जिससे लीची की ताजगी बरकरार रहती है. इसके अलावा, बिहार की प्रसिद्ध जीआई-टैग्ड (GI-tagged) लीची को आधुनिक पैकेजिंग में पेश किया जा रहा है, जो ई-कॉमर्स और बड़े रिटेल स्टोर के लिए बिल्कुल बेहतर है.
सुपरप्लम के फाउंडर और सीईओ शोभित गुप्ता के अनुसार, कंपनी का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य दिलाना है. दाम के आधार पर प्रीमियम दाम देती है, जिससे अच्छी और सुरक्षित लीची उगाने वाले किसानों को बाजार की सामान्य दरों से बेहदर मुनाफा होता है. इसमें किसान अपनी फसल की प्री-बुकिंग करते हैं और पहले ही उपज की दर निर्धारित कर सकते हैं. इससे उन्हें बिक्री की चिंता नहीं रहती और सीधे खेत पर ही भुगतान की सुविधा मिलती है.
डिजिटल पेमेंट और 'प्री-हार्वेस्ट प्राइस' की जानकारी मिलने से किसानों के साथ धोखाधड़ी की गुंजाइश खत्म हो गई है, जिससे मुजफ्फरपुर के किसानों को 100 फीसदी फसल बिकने की गारंटी मिल रही है.
इस स्टार्ट-अप के सीनियर डायरेक्टर डॉ. अरविंद कुमार ने बताया कि लीची को जल्दी खराब होने से बचाने के लिए वे आधुनिक सॉफ्टवेयर और 'रीयल-टाइम ट्रैकिंग' तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. अब खेत के पास ही प्रोसेसिंग और कूलिंग की जाती है, जिससे जो लीची पहले 1-2 दिन में खराब हो जाती थी, वह अब 7 से 8 दिनों तक ताजी बनी रहती है. सबसे खास बात यह है कि उपभोक्ता लीची के पैकेट पर दिए गए 'InstaTrace' क्यूआर कोड को स्कैन करके यह जान सकते हैं कि यह फल किस किसान ने और किस जगह उगाया है. कंपनी की 210 से अधिक लोगों की विशेषज्ञ टीम यह सुनिश्चित करती है कि फल कम से कम समय में ग्राहकों तक पहुंचे.
सुपरप्लम ने लीची उद्योग में 'सल्फेट-मुक्त' कोल्ड चेन तकनीक पेश की है. पहले लीची को बचाने के लिए हानिकारक सल्फर का उपयोग होता था, जिसे कंपनी ने पूरी तरह खत्म कर दिया है. इसी तकनीक की मदद से बिहार से दुबई तक लीची की पहली समुद्री खेप सफलतापूर्वक भेजी गई, जो 15 दिनों के सफर के बाद भी एकदम ताजी थी. अब बिहार की शाही लीची न केवल चेन्नई, कोच्चि और बेंगलुरु जैसे भारतीय शहरों में, बल्कि कनाडा, यूरोप और खाड़ी देशों के अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपनी पहचान बना रही है.
सुपरप्लम केवल फल खरीदती ही नहीं, बल्कि किसानों को वैज्ञानिक खेती के गुर भी सिखा रही है. बिहार में लीची उत्पादन वाले जिलों में ट्रेनिग करके किसानों को कीटनाशकों का कम उपयोग करने और 'ग्लोबल गैप' जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाने की जानकारी दी जा रही है. पिछले 6 वर्षों के काम से पैदावार बढ़ी है और बर्बादी कम हुई है. कंपनी इस साल अपने निर्यात को तीन गुना करने का लक्ष्य रख रही है. लीची के साथ-साथ यह स्टार्टअप आम, सेब, अंगूर, केला और पपीता जैसे फलों पर भी काम कर रहा है, ताकि बिहार की लीची को दुनिया भर में एक बड़ा 'ग्लोबल ब्रांड' बनाया जा सके.