
इथेनॉल और पोल्ट्री इंडस्ट्री में भारी मांग के बावजूद किसान क्यों औने-पौने दाम पर मक्का बेचने को मजबूर हैं? यह सवाल हर किसी के मन में आ रहा है. दरअसल, सरकार ने खुद मक्का किसानों की बर्बादी की स्क्रिप्ट लिखी. पोल्ट्री सेक्टर के चंद उद्योगपतियों के हित साधने के लिए लाखों किसानों को संकट में डाल दिया गया. भारत के अपने किसानों का उगाया गया मक्का बिक नहीं रहा है और सरकार ने इंडस्ट्री के कहने पर करीब 10 लाख टन मक्का दूसरे देशों से मंगा लिया. इससे उद्योगों की तो बल्ले-बल्ले हो गई लेकिन मक्का की खेती करने वाले किसान बर्बाद हो गए. उद्योगों की अपील पर खाद्य और वाणिज्य मंत्रालय ने अपनी भूमिका बखूबी अदा की, लेकिन जिस कृषि मंत्रालय को किसानों की इनकम डबल करने का जिम्मा मिला हुआ है वो मौन बैठा रहा. किसान तक ने जुलाई 2024 में ही 'मक्के के दाम को कंट्रोल करेगी सरकार, उद्योग जगत की वकालत शुरू...किसानों की किसे परवाह?' शीर्षक से रिपोर्ट जारी करके उन लोगों को आगाह कर दिया था जो मक्के की खेती करते हैं.
भारत जैसे ज्यादा उपभोक्तओं वाले देश के लिए 10 लाख टन मक्का कोई मायने नहीं रखता, लेकिन इतना आयात बाजार का सेंटीमेंट खराब करने के लिए काफी है. यही हुआ भी. आज किसानों को 2400 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) वाला मक्का महज 1200 से 1600 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बेचना पड़ रहा है तो इसके पीछे आयात एक बड़ी वजह है. पिछले करीब एक साल से मक्का एमएसपी से नीचे बिक रहा है, इसके बावजूद कृषि मंत्रालय गहरी नींद में सोया हुआ है. जैसे वह भूल चुका है कि उसे ही किसानों की आय डबल करने का काम मिला हुआ है.
सवाल यह है कि जब खाद्य और वाणिज्य मंत्रालय उद्योगपतियों की मांगों को मानकर मक्का आयात करने का फैसला ले रहे थे तब कृषि मंत्रालय किसानों के हितों के लिए क्यों नहीं खड़ा हुआ? क्या कृषि मंत्रालय ने इस आयात का एक बार भी विरोध किया? क्या कृषि मंत्रालय ने वाणिज्य और खाद्य मंत्रालय को कोई एक चिट्ठी लिखकर यह सवाल पूछा कि जब देश मक्का के मामले में आत्मनिर्भर है तो उसे क्यों आयात किया जा रहा है? दरअसल, ऐसा कुछ नहीं हुआ. किसानों के कल्याण के लिए बनाए गए मंत्रालय का पूरा सिस्टम मुंह बंद किए रहा. नतीजा यह हुआ कि उद्योगपतियों को बेहद सस्ता मक्का मिला और किसानों को कम दाम की सजा मिली.
मार्च 2025 से अब तक मक्का का दाम एमएसपी से नीचे ही चल रहा है. किसानों को मक्का पैदा करने के लिए प्रति क्विंटल 1952 रुपये खर्च करने पड़ते हैं. जबकि इस समय इसका बाजार भाव मात्र 1615 रुपये प्रति क्विंटल ही मिल रहा है. हालांकि, सरकार ने खुद भी 2400 रुपये का सरकारी दाम तय किया हुआ है. लेकिन इस दाम की कोई लीगल गारंटी नहीं है. यहीं पर किसानों की वह मांग जायज लगने लगती है जिसमें वो एमएसपी को कानूनी गारंटी देने की वकालत करते हैं.
बहरहाल, सरकार और इंडस्ट्री के लोग यह कहेंगे कि मक्के का दाम इसलिए गिरा हुआ है क्योंकि किसानों ने जरूरत से ज्यादा पैदा कर लिया. दाम कम होने के पीछे इंडस्ट्री का यही तर्क रहता है. सवाल यह है कि जब किसानों ने जरूरत से ज्यादा मक्का पैदा कर ही लिया था तो फिर आयात करने की क्या जरूरत पड़ी? जब भारत में पर्याप्त मक्का है तो स्वदेशी का नारा लगाने वालों ने आयात क्यों किया? डायरेक्टरेट जनरल ऑफ कमर्शियल इंटेलिजेंस एंड स्टैटिस्टिक्स (DGCIS) के अनुसार केंद्र सरकार ने साल 2024-25 में रिकॉर्ड 9,70,070 मीट्रिक टन मक्का आयात किया. पिछले एक दशक में कभी भी इतना मक्का आयात नहीं किया गया. इस पॉलिसी ने किसानों को तबाह कर दिया.
सरकार ने ऊर्जादाता बनाने और अच्छा दाम मिलने का लालच देकर किसानों को मक्का की खेती करने के लिए उकसाया. लेकिन जब उत्पादन बढ़ गया तो उन्हें मंझधार में छोड़ दिया. अप्रैल 2023 में फिक्की के एक कार्यक्रम में तत्कालीन कृषि सचिव मनोज आहूजा ने कहा था कि इथेनॉल उत्पादन और पोल्ट्री उद्योग की मांग को पूरा करने के लिए भारत को अगले पांच वर्षों में मक्का उत्पादन में 10 मिलियन टन की वृद्धि करने की जरूरत है. उत्पादन मौजूदा 34 मिलियन टन से बढ़ाकर 44-45 मिलियन टन करना पड़ेगा. किसानों ने बात मानी और उन्होंने 2024-25 में उत्पादन बढ़ाकर 434 लाख टन यानी 43.4 मिलियन टन कर दिया. इस काम के लिए किसानों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए था, लेकिन सरकार ने अपनी नीतियों से उन्हें कम दाम का दर्द दे दिया.
कुल मिलाकर भारत इस समय मक्का के मामले में आत्मनिर्भर है. तो फिर क्यों आयात किया गया? दरअसल, आयात दाम गिराने के लिए किया गया, ताकि इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों और पोल्ट्री उद्योग को सस्ता रॉ मैटीरियल मिल सके. वो मुनाफा ज्यादा कमा सकें या फिर उनके मुनाफे में कोई कमी न आए. लेकिन, ऐसी पॉलिसी क्या देश के लिए ठीक है? शायद नहीं. यही सस्ता मक्का एक दिन महंगा पड़ेगा. इसे एक उदाहरण से समझते हैं. अकेले खाद्य तेलों और दलहन आयात पर हम सालाना करीब 2 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं, जो हमारी इकोनॉमी की सेहत के लिए खतरनाक है. लेकिन, आयात करना मजबूरी है क्योंकि हमारे किसान उचित दाम न मिलने की वजह से देश की जरूरत जितना खाद्य तेल और दालें पैदा ही नहीं कर रहे.
नतीजा यह है कि आज हम अपनी जरूरत का 55 फीसदी खाद्य तेल आयात कर रहे हैं. नब्बे के दशक में भारत खाद्य तेलों के मामले में लगभग आत्मनिर्भर था, लेकिन आयात को बढ़ाने वाली नीतियों ने आज खाद्य तेलों और दालों के मामले में हमें दूसरे देशों पर ही आश्रित होने के लिए बाध्य कर दिया है. यही हाल मक्का को लेकर भी होने वाला है. दूसरे देश आज तो सस्ता मक्का दे देंगे लेकिन जब भारतीय किसानों को इसका दाम नहीं मिलेगा तो वो इसकी खेती छोड़ देंगे. इसके बाद भारत में मक्के की खेती खेती सिमट जाएगी. फिर आप मक्के के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हो जाएंगे और आयात निर्भर देश ब्लैकमेलिंग का शिकार होगा. सिर्फ दाम के मामले में ही नहीं बल्कि कूटनीति के मोर्चे पर भी. अगर यकीन न हो साठ के दशक में गेहूं के लिए अमेरिका की ब्लैकमेलिंग याद कर लीजिएगा.
इसे भी पढ़ें: भारत ने चावल उत्पादन में तोड़ा चीन का रिकॉर्ड, ताइवान ने की मदद...कामयाबी पर अमेरिका की मुहर
इसे भी पढ़ें: Pulses Crisis: उत्पादन कम, मांग ज्यादा...फिर भी MSP से नीचे क्यों आया दालों का दाम?