
ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध का असर कई देशों में देखने को मिल रहा है. इस वजह से पूरी दुनिया परेशान है, लेकिन राजस्थान के अलवर और आसपास के इलाकों में किसान और व्यापारी खुश नजर आ रहे हैं. दरअसल, अलवर की अनाज मंडी में इस समय सरसों की भरपूर आवक हो रही है. आमतौर पर देश में हर साल करीब 10 लाख टन सरसों का स्टॉक बचा रहता है, लेकिन इस बार हालात अलग हैं. युद्ध के कारण विदेशों से आने वाले खाने के तेल जैसे, सोयाबीन, पाम, मूंगफली और तिल का तेल कम कम आयात हो रहे हैं. इससे देश में सरसों और सरसों के तेल की मांग तेजी से बढ़ गई है. और इसी वजह से इसके दाम भी तेजी से ऊपर जा रहे हैं, जिससे किसानों को फायदा मिल रहा है.
खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध का असर अब तेल के बाजार पर दिखने लगा है. देश में खाने के तेल की कमी हो रही है, जिससे किसानों और व्यापारियों को फायदा मिल रहा है. पहली बार सरसों का दाम करीब 7100 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है और बाजार में तेल के दाम भी तेजी से बढ़ रहे हैं. जब अलवर की अनाज मंडी का हाल देखा गया, तो वहां हर तरफ सरसों के ढेर लगे हुए थे, जो मजदूर (पल्लेदार) पहले दिन में खाली रहते थे, वे अब दिन-रात काम कर रहे हैं, क्योंकि काम बहुत बढ़ गया है.
मंडी में राजस्थान खाद्य पदार्थ संघ के पदाधिकारी सुरेश चंद्र अग्रवाल ने बताया कि देश में कुल सरसों उत्पादन का करीब 50 फीसदी अकेला राजस्थान करता है. राजस्थान में भी सबसे ज्यादा सरसों अलवर, भरतपुर, झुंझुनू, सीकर, करौली और दौसा जैसे इलाकों में होती है. वहीं, अलवर में सरसों के तेल की सबसे ज्यादा मिलें हैं और यहां से पूरे देश में तेल सप्लाई होता है. युद्ध की वजह से विदेशों से आने वाला तेल बहुत कम हो गया है, जिससे सरसों के तेल की मांग बढ़ गई है और इसके दाम भी तेजी से ऊपर जा रहे हैं. इससे किसानों और व्यापारियों को फायदा मिल रहा है और किसान अच्छे दाम मिलने से खुश हैं.
व्यापारियों के मुताबिक, इस साल अलवर और भरतपुर जैसे बड़े सरसों उत्पादक जिलों में पैदावार भी अच्छी हुई है और क्वालिटी भी बेहतर है. आमतौर पर सरसों से करीब 40 फीसदी ही तेल निकलता है, लेकिन इस बार यह बढ़कर 42–43 फीसदी तक पहुंच गया है, यानी 100 किलो सरसों में करीब 43 किलो तेल निकल रहा है. इससे किसानों को ज्यादा फायदा मिल रहा है. वहीं, अलवर मंडी में हर दिन करीब 35 से 40 हजार कट्टे सरसों आ रही है, जिससे मंडी में काफी चहल-पहल बनी हुई है.
मंडी के व्यापारी सौरभ कालरा ने बताया कि भारत में खाने के तेल का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है. जैसे पाम ऑयल मलेशिया से और सोयाबीन तेल अमेरिका से आता है. कुल मिलाकर भारत का तेल उद्योग करीब 55 फीसदी विदेशों पर निर्भर है, जबकि सिर्फ 45 फीसदी तेल देश में ही पैदा होता है. पिछले साल देश में करीब 117 लाख टन सरसों हुई थी, जबकि इस साल यह घटकर करीब 111 लाख टन रहने का अनुमान है. लेकिन इस बार सरसों में तेल की मात्रा थोड़ी ज्यादा (करीब 2% ज्यादा) रहने की उम्मीद है, जिससे फायदा हो सकता है.
उन्होंने कहा कि अगर खाड़ी देशों का युद्ध लंबा चला, तो सरसों के दाम और बढ़ सकते हैं. पहले विदेश से तेल आने की वजह से देश में करीब 10 लाख टन सरसों का स्टॉक बचा रहता था, लेकिन इस बार वह खत्म होने की संभावना है. डॉलर महंगा होने की वजह से भी विदेशी तेल महंगा पड़ रहा है. हालांकि, अगर युद्ध ज्यादा लंबा चला तो आम लोगों को महंगे तेल की वजह से नुकसान भी उठाना पड़ सकता है. अलवर से बने सरसों के तेल की सबसे ज्यादा खपत बंगाल, असम और बिहार में होती है. यही वजह है कि अलवर सरसों तेल उत्पादन का बड़ा केंद्र बन गया है. यहां करीब 7 बड़े प्लांट और लगभग 80 तेल मिलें हैं.