
राजस्थान के धौलपुर जिले में सिंघाड़े की बंपर पैदावार हुई है. जिले में जगह-जगह लाल पत्थर की खदानों में भरे पानी में इस बार किसानों ने पारंपरिक सिंघाड़े की खेती कर सिंघाड़े की जमकर पैदावार की है.
धौलपुर जिले के दुमंती सिंघाड़े की आगरा, ग्वालियर और दिल्ली तक डिमांड हैं. साथ ही पानी के इस फल की धौलपुर ही नहीं आस-पास की मंडियों में भी डिमांड बनी हुई है. धौलपुर जिले से होकर गुजर रहे करौली-धौलपुर हाइवे एनएच ग्यारह बी के बाड़ी रोड पर करीब पचास से अधिक किसान फड़ लगा कर सिंघाड़े बेच रहे हैंं. इस हाइवे से गुजरने वाले राहगीर और यात्री जम कर सिंघाड़े खरीद रहे है.
धौलपुर का सिंघाड़ा औषधि और आटे के लिए काम में लिया जाता है. धीरे-धीरे सर्दी की रंगत जमने के साथ ही बाजार में भी सिंघाड़े की बहार सी आ गई है और धौलपुर के सिंघाड़े की मिठास लोगो को लुभा रही है.
धौलपुर जिले में ज्यादातर सिंघाड़े की पारंपरिक खेती बाड़ी, सरमथुरा और डांग इलाके में करीब डेढ़ सौ जगह की जाती हैं. लेकिन दुमंती सिंघाड़े की मिठास के लोग कायल हैं. सिंघाड़े की बंपर पैदावार के चलते किसान काफी खुश नजर आ रहे हैं. इस सिंघाड़े की मिठास और फल की खूबसूरती से खरीदार इनके कायल रहते हैं. सिंघाड़े की मंडी में अच्छी कीमत मिलने से किसान खुश हैं. मंडी में 20 रुपये किलोग्राम सिंघाड़े का भाव मिल रहा है और 25 से 30 रुपये में बेचा जा रहा है.
किसान विरमा, अनिल कुमार और बचनदेवी ने बताया कि सिंघाड़े की खेती को उनके पूर्वज करते आ रहे हैंं. पत्थर की खदानों और खलतियों में जब बारिश का पानी आना शुरू हो जाता है तो उत्तर प्रदेश के जलेशवर से सिंघाड़े की बेल खरीद कर लाते हैं और वहां गंगा किनारे खेतो में रख देते हैं.
सिंघाड़े की पौध करीब चार हजार रुपये क्विंटल के हिसाब से लाते हैं. पौध से बेल बना कर इन बेलों को पानी में लगा देते हैं, उसके बाद इन बेलों को काट काट कर कई बीघा में फैला देते हैं. एक बीघा में करीब 65 हजार की लागत आती है. कीटनाशक दवा के रूप में गेहूं और बाजरे की दवाई देते हैं. किसानों ने बताया कि सिंघाड़े की खेती के लिए कीटनाशक दवा बाजार में मिलती भी नहीं हैं. दूसरी फसल की दवाई से फायदा नहीं होता है.
किसानों ने बताया कि सिंघाड़ा पानी में रहता है तो इस फल में गिराड़ और अन्य रोग भी लग जाते हैं. किसानों ने बताया कि अक्टूवर महीना शुरू होते बेलों में सिंघाड़ा आना शुरू हो जाता है और दिसंबर-जनवरी तक चलता हैं. किसानों ने बताया कि एक बेल में से करीब सात बार सिंघाड़े की तुड़ाई हो जाती है और दस दिन बाद बेल में फिर फल आ जाता है.
किसानों ने बताया कि धौलपुर के दुमंती सिंघाड़े की डिमांड आगरा, ग्वालियर, दिल्ली और आस-पास की मंडियों में काफी है और भाव भी अच्छा मिलता है. यह खाने में मीठा है और यह स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं. इसमें विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट होता है.
किसानों ने बताया कि सिघांड़े के छिलके को हटा कर जो सफेद फल निकलता है, उसको सुखाने के बाद आटा भी बनाया जाता हैं जिसका हलवा और खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैंं. गर्मी के दिनों में यह काफी ठंडक देता हैं. यह खून की कमी को पूरा करता है और यह साफ पानी में ही लगता है.
किसानों ने बताया कि इस बार सिंघाड़े का सीजन लंबा चलने की उम्मीद है. पानी की भी कोई कमी नहीं है. किसानों ने बताया कि सिंघाड़े की खेती में जोखिम और मेहनत ज्यादा है. धौलपुर जिले में दुमंती, हरा, लाल, बैगनी रंग के सिंघाड़े की किस्में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं.
सिंघाड़ा एक स्वादिष्ट, मीठा और पौष्टिक फल है, जिसकी व्रत-उपवास में ज्यादा डिमांड रहती है. सिंघाड़े में विटामिन-ए, सी, मैंगनीज, थायमाइन, कर्बोहाईड्रेट, सिट्रिक एसिड, प्रोटीन, फैट और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैंं जो शरीर को कई फायदे पहुंचाने में मदद करते हैं.
सिंघाड़ा शरीर की कमजोरी को दूर करने में मददगार साबित होता है, क्योंकि इसमें कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैल्शियम, जिंक और फॉस्फोरस जैसे तत्व पाए जाते हैंं, जो शरीर की शक्ति को बढ़ाते हैंं. थायरॉयड के मरीज के लिए यह वरदान से कम नहीं है.
सिंघाड़ा पानी का फल है, लेकिन यह फल कीट-रोगों की चपेट में आ जाता है. वाटर बीटल, रेड डेट, नील भृंग, महू और घुन के कारण सिंघाड़े को काफी नुकसान होता है. इसकी रोकथाम के लिए बाजार में कीटनाशक दवा मिलती नहीं हैं. किसान गेहूं और बाजरा और अन्य फसलों में दी जाने वाली कीटनाशक का उपयोग करते हैंं.