
पंजाब के संगरूर जिले में धान की कटाई के साथ ही पराली जलाने की घटनाओं में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है. प्रशासन की ओर से पराली प्रबंधन के लिए किए जा रहे इंतजामों और जागरुकता अभियानों के बावजूद खेतों में आग लगने की घटनाएं सामने आ रही हैं. 31 अक्टूबर 2026 को सैटेलाइट के जरिए संगरूर जिले में करीब 32 खेतों में आग लगने की घटनाएं दर्ज की गईं. इनमें से करीब 13 घटनाएं मालेरकोटला जिले में सामने आईं. वहीं, पूरे पंजाब में लगभग 50 घटनाओं के साथ तरनतारन पहले और संगरूर दूसरे स्थान पर रहा.
संगरूर के एक गांव से सामने आई ड्रोन तस्वीरों ने पराली जलाने की समस्या की गंभीरता को उजागर किया है. ड्रोन कैमरे से ली गई इन तस्वीरों में खेतों के अलग-अलग हिस्सों में पराली जलती दिखाई दे रही है. कई स्थानों से धुएं के गुबार उठते साफ नजर आ रहे हैं.
ये तस्वीरें केवल एक गांव की हैं, लेकिन एक ही गांव में इतनी जगहों पर पराली जलती दिखाई देना जिले की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि जब प्रशासन की ओर से बड़े स्तर पर पराली प्रबंधन के इंतजाम किए जाने के दावे किए जा रहे हैं, तो इसके बावजूद खेतों में आग लगाने की घटनाएं क्यों नहीं रुक पा रही हैं?
गौरतलब है कि पराली जलाने की इन घटनाओं से ठीक एक दिन पहले वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की उच्चस्तरीय टीम ने संगरूर, पटियाला और मालेरकोटला में पराली प्रबंधन के प्रयासों की समीक्षा की थी. टीम में शामिल अधिकारियों ने जिला प्रशासन की ओर से किए जा रहे प्रयासों की सराहना भी की थी.
हालांकि, समीक्षा के अगले ही दिन संगरूर में पराली जलाने की करीब 32 घटनाएं सामने आने से प्रशासन के इंतजामों पर सवाल खड़े हो रहे हैं. इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सरकारी स्तर पर किए जा रहे प्रयास किसानों की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर पा रहे हैं?
अगर पिछले साल यानी 2025 के आंकड़ों पर नजर डालें तो पंजाब में पूरे सीजन के दौरान पराली जलाने की कुल 5,114 घटनाएं दर्ज की गई थीं. वहीं, 24 नवंबर 2025 तक संगरूर जिले में 695 घटनाएं सामने आई थीं. तरनतारन में 696 घटनाएं दर्ज की गई थीं.
इन आंकड़ों से साफ है कि संगरूर पिछले साल भी पराली जलाने से प्रभावित प्रमुख जिलों में शामिल था. इस बार भी शुरुआती आंकड़े जिले में पराली प्रबंधन की चुनौती बने रहने की ओर इशारा कर रहे हैं.
इस बार संगरूर में पराली प्रबंधन की चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि जिले में हर साल करीब 14 लाख मीट्रिक टन पराली पैदा होती है. कृषि विभाग के चीफ के मुताबिक, करीब साढ़े छह लाख मीट्रिक टन पराली के प्रबंधन के लिए बेलर मशीनों की व्यवस्था उपलब्ध है.
पहले विकल्प के तहत बेलर मशीनों की मदद से खेतों में पड़ी पराली की गांठें बनाई जाती हैं. इसके बाद इन गांठों को खेतों से उठाकर पेलेट बनाने वाली फैक्ट्रियों और अन्य औद्योगिक इकाइयों तक पहुंचाया जाता है, जहां इनका इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जा सकता है.
दूसरे विकल्प के तहत सुपर सीडर जैसी मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है. इन मशीनों की मदद से पराली को खेत में ही मिट्टी में मिलाकर गेहूं की बिजाई की जाती है. इससे पराली को जलाने की जरूरत नहीं पड़ती और खेत में ही उसका प्रबंधन हो जाता है.
किसानों का कहना है कि पराली प्रबंधन के लिए सरकारी स्तर पर इंतजाम तो किए जा रहे हैं, लेकिन जरूरत के समय उन्हें बेलर मशीनें उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं. धान की कटाई के बाद गेहूं की बिजाई के लिए किसानों के पास केवल 10 से 15 दिन का समय बचता है. ऐसे में अगर समय पर मशीनें नहीं मिलतीं तो उनके सामने पराली का प्रबंधन करने और अगली फसल की बिजाई करने की बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है.
किसानों के मुताबिक, इस बार धान का सीजन शुरू होने से पहले हुई बारिश के कारण फसल की कटाई में देरी हुई. इससे किसानों को पहले ही आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है. अब गेहूं की बिजाई के लिए भी समय कम रह गया है.
किसानों का कहना है कि वे लगातार बेलर मशीन मालिकों को फोन कर रहे हैं, लेकिन उन्हें समय पर मशीनें नहीं मिल पा रही हैं. ऐसे में कई किसानों के सामने पराली के निपटारे का विकल्प सीमित हो जाता है.
पराली प्रबंधन के मामले में छोटे किसानों की मुश्किलें और भी ज्यादा हैं. किसानों के मुताबिक, बेलर मशीनों के साथ भारी ट्रैक्टर और अन्य मशीनरी की जरूरत होती है. छोटे खेतों में मशीनों से काम करने पर मशीन मालिकों को उतना आर्थिक फायदा नहीं होता, जितना बड़े खेतों में काम करने से होता है.
इसी वजह से छोटे किसानों को मशीनें मिलने में प्राथमिकता नहीं मिल पाती. कई बार उन्हें लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है, जबकि गेहूं की बिजाई का समय लगातार निकलता रहता है.
किसानों का कहना है कि पराली प्रबंधन की योजनाओं का फायदा तभी मिल सकता है, जब मशीनें बड़े किसानों के साथ-साथ छोटे किसानों को भी समय पर उपलब्ध करवाई जाएं.
पराली प्रबंधन के लिए सुपर सीडर को एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है, लेकिन यह मशीन भी हर किसान की पहुंच में नहीं है. इसे चलाने के लिए बड़े हॉर्स पावर वाले ट्रैक्टर की जरूरत होती है.
छोटे किसानों के पास न तो इस क्षमता वाले ट्रैक्टर उपलब्ध हैं और न ही महंगी मशीनें खरीदने की आर्थिक क्षमता है. ऐसे में वे सुपर सीडर तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर पाते.
यानी एक तरफ बेलर मशीनों की उपलब्धता को लेकर किसानों की शिकायतें हैं तो दूसरी तरफ सुपर सीडर के लिए जरूरी संसाधनों की कमी भी पराली प्रबंधन में बाधा बन रही है.(कुलवीर सिंह का इनपुट)