Dairy Survey: दूध बेचने के लिए गाय-भैंस नहीं पालते ये पशुपालक, सर्वे में हुआ खुलासा, जानें वजह 

Dairy Survey: दूध बेचने के लिए गाय-भैंस नहीं पालते ये पशुपालक, सर्वे में हुआ खुलासा, जानें वजह 

Dairy Survey काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) की सर्वे रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि पशुपालकों को राष्ट्रीय पशुधन मिशन (एनएलएम) और संबंधित राज्यों की पशुधन से जुड़ी योजनाओं को अपनाना चाहिए. पशु चिकित्सा सेवाओं में सुधार, गोबर आधारित ऊर्जा और खाद जैसी गैर-दुग्ध मूल्य श्रृंखलाओं को प्रोत्साहन और प्रजनन विकल्पों, पशु आवासों में जलवायु से जुड़े सुझावों को भी जोड़ना शामिल है.

Telangana Vijaya Dairy Expansion Telangana Vijaya Dairy Expansion
नासि‍र हुसैन
  • New Delhi,
  • Jan 21, 2026,
  • Updated Jan 21, 2026, 1:03 PM IST

डेयरी और पशुपालन के क्षेत्र में एक बड़ा सर्वे हुआ है. सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक देश के करीब 38 फीसद पशुपालक ऐसे हैं जो बाजार में दूध बेचने के लिए पशुओं को नहीं पालते हैं. सर्वे में ये भी खुलासा हुआ है कि भैंस और क्रॉस-ब्रीड नस्ल के मवेशियों को पालने वाले 50 फीसद से ज्यादा पशुपालक पशुओं में होने वाली बीमारियों, तनाव और उनकी मौत के लिए जलवायु परिवर्तन का असर महसूस कर रहे हैं. काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के सर्वे में ये खुलासा हुआ है. गौरतलब रहे देश के 15 राज्यों में सात हजार से ज्यादा पशुपालकों के बीच ये सर्वे हुआ है. 

डेयरी एक्सपर्ट का कहना है कि इस सर्वे रिपोर्ट ने पशुपालन और डेयरी से जुड़े साइंटिस्ट को और दूसरे मुद्दों पर भी सोचने को मजबूर कर दिया है. क्योंकि एक ओर तो प्रति पशु दूध उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन पशुपालन पर गहरा असर डाल रहा है. गौरतलब रहे पशुपालन से आठ करोड़ से ज्यादा परिवार जुड़े हुए हैं, वहीं भारत की जीडीपी में ये सेक्टर 5 फीसद का योगदान देता है.

जानें और क्या कहती है सर्वे रिपोर्ट 

  • 7 फीसद पशुपालक दूध को छोड़कर गोबर, जुताई और उनकी बिक्री से होने वाले मुनाफे के लिए पशुपालन करते हैं. पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ऐसे पशुपालक करीब 15 फीसद तक हैं. 
  • करीब 74 फरसद पशुपालक गोबर को खाद, ईंधन या बिक्री के लिए महत्व देते हैं. बहुत से पशुपालक भार खींचने और कृषि में व्यापक सहायता के लिए पशुपालन पर निर्भर हैं. 
  • झारखंड, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश में आधे से ज्यादा पशुपालक दूध की बिक्री की जगह पर परिवार में दूध की खपत और गोबर के उपयोग को प्राथमिकता देते हैं. 
  • महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे डेयरी वाले राज्यों में भी 30 फीसद से ज्यादा पशुपालक दूध के अलावा पशुओं से मिलने वाले दूसरे फायदों को प्राथमिकता देते हैं.

जानें क्या बोले CEEW के डायरेक्टर अभिषेक जैन

CEEW के डायरेक्टर अभिषेक जैन का कहना है कि भारत के डेयरी सेक्टर की नीतियां मुख्य रूप से दूध उत्पादन पर केंद्रित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर पशुपालन एक व्यापक आजीविका तंत्र की तरह काम करता है. वहीं जैसा कि सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है कि अलग-अलग राज्यों और पशुपालक श्रेणियों में पशुपालन के मौजूदा हालात, चुनौतियां और प्रेरणा में काफी फर्क है. मौजूदा हालात के साथ सरकारी निवेश का तालमेल लाने के लिए एक समान डेयरी रणनीतियों की जगह पर अलग-अलग और प्रतिक्रियाशील नीतियों की दिशा में जाने की जरूरत है. जिसमें यह भी शामिल हो कि परिवार वास्तव में मवेशियों को किस तरह से महत्व देते हैं, उन्हें किन बाधाओं का सामना करना पड़ता है, और पशुपालन क्षेत्र के लिए जलवायु जोखिम किस तरह से बड़ा हो रहा है. 

चारे की कमी पर ये हुआ खुलासा 

रुचिरा गोयल, प्रोग्राम एसोसिएट, CEEW का कहना है कि सभी क्षेत्रों में पशुपालन के लिए चारे की कमी बनी हुई है. लेकिन चारे के लिए विभिन्न उपायों को अपनाने की दर काफी कम है. चारे के लिए बेहतर आपूर्ति श्रृंखलाओं के माध्यम से इन कमियों को दूर करने पर छोटे पशुपालकों को तत्काल लाभ मिल सकता है. पशुपालन क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दबाव से सुरक्षित बनाने के लिए, बजट आवंटन को प्रजनन और टीकाकरण कार्यक्रम से आगे बढ़कर चारे के लिए बड़ा करना चाहिए.

स्थानीय उपायों को सहायता देनी चाहिए. ये समाधान स्थानीय जरूरतों के हिसाब से होने चाहिए. उदाहरण के लिए, सूखे और जमीन की कमी वाले क्षेत्रों में हाइड्रोपोनिक्स और अजोला की खेती को प्रोत्साहन और असम जैसे राज्यों में चारागाहों को सुरक्षित बनाना चाहिए. ऐसे निवेश पशुपालन की उत्पादकता, लचीलापन और पर्यावरणीय सततशीलता में एक साथ सुधार ला सकते हैं.

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