Sheep Care: भेड़ों से खूब मिलेगा ऊन-मीट का उत्पादन, बस ये 2 बीमारियां न आएं पास

Sheep Care: भेड़ों से खूब मिलेगा ऊन-मीट का उत्पादन, बस ये 2 बीमारियां न आएं पास

Sheep Care भेड़ पालन खासतौर पर ऊन और मीट के लिए किया जाता था. हालांकि अब मीट के मुकाबले ऊन की डिमांड बहुत कम हो गई है. अब ऊन के लिए भेड़ें कम पाली जाती हैं. ऊन का आयात होने से घरेलू बाजार में डिमांड घट गई है. जबकि मीट की डिमांड तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि अगर भेड़ों से मोटा मुनाफा कमाना है तो उन्हें बीमारियों से दूर रखना होगा.  

नासि‍र हुसैन
  • New Delhi,
  • Feb 18, 2026,
  • Updated Feb 18, 2026, 3:24 PM IST

आज के वक्त में भेड़ को ऊन से ज्यादा मीट के लिए पाला जाता है. लेकिन अगर मीट के साथ-साथ ऊन भी मिल जाए तो इससे भेड़ पालक का मुनाफा बढ़ जाता है. लेकिन अक्सर भेड़ों में होने वाली कुछ खास बीमारियां उनके ऊन और मीट के उत्पादन को घटा देती हैं. यहां तक की जो उत्पादन होता भी है तो उसकी लागत बढ़ जाती है. क्योंकि एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि पशुपालन छोटे पशुओं का किया जाए या बड़े पशुओं का उस पर खुराक और बीमारियों पर सबसे ज्यादा खर्च होता है. एक्सपर्ट का ये भी कहना है कि अगर बकरी की तरह से भेड़ पालन में भी अगर मेमनों की मृत्यु दर को कंट्रोल कर लिया जाए तो फिर मुनाफा बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता है. 

लेकिन ये तभी मुमकिन है जब भेड़ पालक साइंटीफिक तरीका अपनाकर भेड़ पालन करें. कुछ बातों का ख्याल रखकर पशुओं में होने वाली बीमारियों की रोकथाम जरूर की जा सकती है. आमतौर पर भेड़-बकरी की बीमारियां एक जैसी ही होती हैं, लेकिन दोनों के पालन में अंतर है. क्योंकि बकरियों के मुकाबले भेड़ों को खुले में ज्यादा चराया जाता है. 

खतरनाक है कन्टेजियस एकथाईमा बीमारी

एरिया के हिसाब से भेड़ों की कन्टेजियस एकथाईमा बीमारी को पशुपालक अलग-अलग नाम से जानते हैं. जैसे पहाड़ी इलाकों गददी भेड़ पालने वाले इस बीमारी को मौढ़े कहते हैं. यह बीमारी एक खास तरह के विषाणु से होती है. इसके चलते भेड़ के मुंह-नाक और होठों के बाहरी तरफ फोड़े हो जाते हैं. वक्त से इलाज ना मिलने पर ये काफी बढ़ जाते हैं, जिसके चलते भेड़ का मुंह फूल जाता है. भेड़ को घास खाने में तकलीफ का सामना करना पड़ता है. साथ ही साथ बीमार भेड़ को हल्का बुखार भी आ जाता है.

ऐसे बचाएं कन्टेजियस एकथाईमा से 

बीमार भेड़ को अलग कर उनका इलाज कराना चाहिए. 
हर रोज फोड़ों को लाल दवाई के घोल से धोएं. 
भेड़ के फोड़ों पर एन्टीसेप्टिक मलहम लगाना चाहिए. 
डॉक्टर की सलाह पर एंटीबायोटिक इन्जेक्शन लगवाएं. 

जानलेवा है एन्थ्रेक्स बीमारी 

एन्थ्रेक्स बीमारी को भेड़ पालक रक्तांजली बीमारी के नाम से जानते हैं. यह रोग जीवाणु द्वारा होता है. इस बीमारी के होने पर भेड़ को बहुत ते बुखार आता है. सही वक्त पर इलाज ना मिलने पर भेड़ की मौत तक हो जाती है. जब भेड़ की मौत होने वाली होती है तो उसके नाक-कान, मुंह और गुदा से खून आने लगता है.

भेड़ों को ऐसे बचा सकते हैं एन्थ्रेक्स से 

एन्थ्रेक्स से मरने वाली भेड़ों की खाल नहीं निकानी चाहिए. 
मरी हुई भेड़ को गहरे गड्ढे में दबा देना चाहिए. 
जहां भेड़ मरे उस शेड को खत्म कर नया शेड बनाएं. 
भेड़ों की चरागाह को भी बदल देना चाहिए. 
डॉक्टर की सलाह पर एंटीबायोटिक इन्जेक्शन लगवाएं. 
सरकारी केन्द्र पर चार्ट के अनुसार भेड़ का वैक्सीनेशन कराएं.

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