
पंजाब के तरनतारन जिले के गांव सोहल के 39 वर्षीय किसान हरप्रीत सिंह ने डेयरी फार्मिंग की पुरानी रवायत को आधुनिक तकनीक से बदलकर एक नई मिसाल कायम की है. जहां आज पशुपालन को लोग घाटे का सौदा मानते हैं, वहीं हरप्रीत ने अपनी सूझबूझ और 'स्मार्ट तकनीक' से विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है. उनके पास 150 मवेशियों का विशाल कुनबा है, जिसे उन्होंने करीब 32,000 वर्ग फुट के व्यवस्थित फार्म में रखा है. कमाल की बात यह है कि इतने बड़े सेटअप को वे मशीनीकरण की बदौलत महज 5 मजदूरों के साथ बखूबी संभाल रहे हैं. यहां दूध निकालने से लेकर गोबर की सफाई तक के लिए आधुनिक 'मैकेनाइज्ड सिस्टम' का इस्तेमाल होता है. वैज्ञानिक तरीके से तैयार साल भर का पौष्टिक आहार (साइलेज) पशुओं को दिया जाता है, जिससे दूध का बंपर उत्पादन हो रहा है. हरप्रीत की यह कामयाबी महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि आधुनिक सोच और कड़ी मेहनत का शानदार नतीजा है.
हरप्रीत सिंह के फार्म की सबसे बड़ी खूबी यहां का एआई वेस मानिटरिंग सिस्टम है. यह तकनीक किसी जादू से कम नहीं है, क्योंकि यह हर मवेशी की चौबीसों घंटे निगरानी करती है. चाहे मवेशी की सेहत खराब हो, उसे गर्मी का तनाव सता रहा हो या उसके व्यवहार में कोई मामूली सा बदलाव आए, यह सिस्टम फौरन अलर्ट जारी कर देता है. इससे बीमारियों का इलाज वक्त रहते मुमकिन हो पाता है और मवेशियों की प्रजनन क्षमतामें भी सुधार आता है. यह तकनीक 'इंसानी चूक' की गुंजाइश को खत्म कर देती है, जिससे फार्म की उत्पादकता में जबरदस्त इजाफा हुआ है.
डेयरी फार्मिंग में सबसे बड़ा खर्चा चारे और खुराक का होता है. हरप्रीत ने इस मसले का हल साइलेज के नरिए निकाला है. उन्होंने 70 एकड़ जमीन पर विशेष रूप से मक्के की खेती की है ताकि उनके पशुओं को साल भर उच्च गुणवत्ता वाला हरा चारा मिल सके. उनके पास 14,400 क्यूबिक फीट के चार विशाल साइलो पिट हैं, जिनमें 1200 टन साइलेज जमा करने की क्षमता है. इसके साथ ही वे टोटल मिक्स रेसियो (TMR) तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जिससे पशुओं को संतुलित आहार मिलता है. इस 'किफायती' और 'लाजवाब' मैनेजमेंट की वजह से दूध के उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है और लागत में भारी कमी आई है.
शुद्धता और स्वच्छता हरप्रीत के फार्म का खासियत है. उन्होंने दूध निकालने के लिए आधुनिक मिल्क पार्लर और उसे सुरक्षित रखने के लिए बल्क मिल्क चिलिग टैंक लगाया है. इससे दूध निकालने के फौरन बाद उसे ठंडा कर दिया जाता है, जिससे उसकी गुणवत्ता और 'लज्जत' बरकरार रहती है. फार्म की सफाई के लिए उन्होंने 'मैकेनाइज्ड स्क्रैपर सिस्टम' अपनाया है, जो गोबर को खुद-ब-खुद साफ कर देता है. सबसे बड़ी खूबी यह है कि इस कचरे को वे खाद के रूप में अपनी फसलों में इस्तेमाल करते हैं, जिससे रासायनिक खादों की जरूरत कम हो गई है और खेती भी 'सस्टेनेबल' बन गई है.
आमतौर पर इतने बड़े डेयरी फार्म को चलाने के लिए दर्जनों मजदूरों की फौज चाहिए होती है, लेकिन हरप्रीत सिंह का फार्म 'स्मार्ट मैनेजमेंट' की जीती-जागती मिसाल है. वैज्ञानिक तकनीकों और मशीनीकरण के दम पर महज पांच ट्रेंड लोग पूरे 150 मवेशियों और 1,800 लीटर औसत दैनिक दूध उत्पादन को बखूबी संभाल रहे हैं. सर्दियों में तो यह उत्पादन 2,400 लीटर तक पहुंच जाता है. उनके दूध की क्वालिटी इतनी उम्दा है कि नेस्ले जैसी बड़ी कंपनी इसे प्रीमियम रेट पर खरीदती है. यह इस बात का सबूत है कि अगर 'नियत' साफ हो और 'तकनीक' आधुनिक, तो कामयाबी कदम चूमती है.
हरप्रीत की इस मेहनत को सरकार और संस्थाओं ने भी खूब सराहा है. उन्हें साल 2024 में मुख्यमंत्री पुरस्कार से नवाजा गया और नेस्ले इंडिया की तरफ से भी सम्मानित किया गया. उनकी यह 'इनोवेशन' न केवल पंजाब बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए एक 'रोशनी' है. हरप्रीत का मानना है कि अगर इस मॉडल को सही सरकारी सहयोग और ट्रेनिंग के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो छोटे किसान भी अपने कारोबार को मुनाफे का सौदा बना सकते हैं. उनकी कहानी हमें सिखाती है कि डेयरी फार्मिंग सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक 'साइंस' है जिसे जज्बे के साथ जिया जाए तो यह तकदीर बदल सकता है.