
दिसंबर के आखिरी सप्ताह में ठंड का कहर पूरे उत्तर भारत और पहाड़ी इलाकों में देखने को मिल रहा है. ठंड की वजह से ना सिर्फ लोगों को बल्कि जानवरों को भी कई समस्या होती है. खासकर ठंड के मौसम में बीमारी का खतरा भी बढ़ जाता है. ऐसे में जरूरी है कि पशुपालक ठंड के मौसम में अपने साथ-साथ पशुओं का भी खयाल रखें ताकि उन्हें ठंड के कहर से बचाया जा सके. ऐसे में आइए जानते हैं ठंड की वजह से पशुओं में किन बीमारी का खतरा सबसे अधिक रहता है.
ठंड के मौसम में पशुपालकों की भी परेशानी बढ़ गई है. दूध उत्पादन प्रभावित होने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता. पशुओं को ठंड के साथ-साथ खुरपका-मुंहपका व अन्य बीमारियों का भी खतरा रहता है.
इन दिनों मौसम में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है. जिस वजह से जानवरों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें एक बंद जगहों में रखें. लेकिन ध्यान रहे की पर्याप्त हवा का संचार उस जगह पर होता रहे. जानवरों को बांधने वाले स्थान के नीचे पुआल या सूखा भूसा डाल दें. उन्हें ताजा पानी दें गंदा पानी न दें. धूप में पशुओं को नहाने का काम करें. साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें. सप्ताह में एक बार चूना और राख मिलाकर सतह पर छिड़कें और साफ करें.
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पशु मौसम के उतार-चढ़ाव को बर्दाश्त नहीं कर पाते. ऐसे में ठंड की वजह से दुधारू पशुओं में दूध की मात्रा कम हो सकती है. दूध की मात्रा बनाए रखने के लिए प्रतिदिन 250 ग्राम गुड़ दें. पशु के खान-पान का ध्यान रखें. सूखा चारा और हरा चारा दो से एक के अनुपात में रखें. दो भाग सूखा और एक भाग हरा चारा दें. सूखा चारा शरीर में ऊर्जा बनाए रखता है. पशुओं को सेंधा नमक खिलाएं. इसे खिलाने से प्यास बढ़ेगी और शरीर में पानी की मात्रा भी पूरी रहेगी.
पशुपालकों के लिए यह जानना जरूरी होगा कि खुरपका-मुंहपका रोग क्या है. इसमें मुंह और खुर में घाव हो जाते हैं. जिसके कारण पशु चल नहीं पाता और खाने में दिक्कत आती है. यदि पशु चारा नहीं खायेंगे तो शरीर कमजोर हो जायेगा. अगर यह किसी भी जानवर को एक बार हो जाए तो इसका असर जीवन भर रहता है. अगर यह पशु को शिशु अवस्था में हो तो उन्हें बचाना मुश्किल हो जाता है. वयस्कों की तुलना में बच्चों में मृत्यु दर अधिक है. यह बैक्टीरिया से फैलता है. यदि यह एक व्यक्ति के साथ होता है, तो यह अन्य पशुओं को भी हो सकता है.
विदेशी गायों में स्तनदाह यानी थनेला रोग की शिकायत अधिक रहती है. क्योंकि यह अधिक दूध देता है. ज्यादातर मामलों में, यह गर्भधारण के 10-15 दिनों के भीतर होता है. बचाव के लिए दूध निकालने के बाद रूई को बीटाडीन में भिगोकर थन के सिरे पर लगाएं. साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें.