EL-Nino: डेयरी-पशुपालन पर बढ़ा अल नीनो का खतरा, कम हो सकता है दूध उत्पादन!

EL-Nino: डेयरी-पशुपालन पर बढ़ा अल नीनो का खतरा, कम हो सकता है दूध उत्पादन!

खेती-किसानी के साथ ही पशुपालन और डेयरी पर भी अल नीनो का असर देखने को मिल सकता है. डेयरी एक्सपर्ट की मानें तो ये सीधे तौर पर पशुओं के उत्पादन को प्रभावित करेगा. जिसके चलते डेयरी प्रोडक्ट के दाम भी बढ़ सकते हैं. हालांकि ये भी कहा जा रहा है कि अल नीनो से निपटने के लिए पहले से पूरी तैयारी है. 

नासि‍र हुसैन
  • New Delhi,
  • Jun 08, 2026,
  • Updated Jun 08, 2026, 12:33 PM IST

अल नीनो की चर्चाओं के साथ डर भी सता रहा है. डर है उत्पादन कम होने का. अल नीनो का यही डर डेयरी सेक्टर को भी सता रहा है. क्योंकि डेयरी एक्सपर्ट की मानें तो अल नीनो का असर डेयरी और पशुपालन के उत्पादन पर भी देखने को मिलेगा. बड़ी परेशानी की बात ये है कि गर्मी के इस मौसम में वैसे ही हर साल पशुपालक कई तरह की परेशानियों से दो-चार होते हैं, ऐसे में अब अल नीनो का असर भी देखने को मिलेगा. अल नीनो पशुओं को भी प्रभावित कर सकता है. 

आशंका ये भी जताई जा रही है कि इस मौसम में दूध के दाम एक बार फिर से बढ़ सकते हैं. हालांकि इसके पीछे वजह सिर्फ अल नीनो ही नहीं होगा, बल्कि ईरान-अमेरिका विवाद भी एक बड़ी वजह है. क्योंकि तेल महंगा होने के साथ-साथ अल नीनो की वजह से फीड और फोडर के दाम भी बढ़ेंगे. जो सीधे तौर पर दूध की लागत को बढ़ाने का काम करेंगे. 

25-30 फीसद महंगे हैं फीड-फोडर

अमूल के पूर्व एमडी और इंडियन डेयरी एसोसिएशन के पूर्व प्रेसिडेंट डॉ. आरएस सोढ़ी ने अल नीनो के प्रभाव के बारे में किसान तक से बात करते हुए बताया कि अल नीनो के असर के चलते बारिश कम होगी ओर गर्मी ज्यादा पड़ेगी. ये दोनों ही असर चारे की खेती को प्रभावित करेंगे. हालांकि पशुओं के फोडर जिसमे सूखा और हरा चारा शामिल है, वहीं फीड जिसमे मक्का-सोयाबीन, ऑयल केक आदि शामिल हैं कि दाम पहले से ही 25 से 30 फीसद तक महंगे हैं. ऐसे में अगर अल नीनो का असर हुआ तो इनकी कमी भी देखने को मिल सकती है. कमी होगी तो दाम बढ़ेंगे. 

फ्लश सीजन से होगी अल नीनो की भरपाई

डॉ. सोढ़ी ने बताया कि अल नीनो से दूध उत्पादन पर जो असर पड़ेगा उसकी भरपाई की जा सकती है. इसलिए बाजार और उपभोक्ताओं को बहुत ज्यादा डरने की जरूरत नहीं है. हर साल गर्मियों को देखते हुए बहुत सारे डेयरी प्लांट फ्लश सीजन नाम से तैयारी करके चलते हैं. इसमे होता ये है कि सर्दियों में जब दूध डिमांड से ज्यादा आता है तो उसका बटर और पाउडर बनाकर रख लिया जाता है. और जब गर्मियों में दूध उत्पादन कम होता है और दही, छाछ, आइसक्रीम के चलते डिमांड बढ़ जाती है तो फ्लश सीजन से उसकी भरपाई कर दी जाती है. दूध पाउडर और बटर को मिलाकर दोबारा से दूध बना दिया जाता है. 

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