बढ़ते तापमान ने बढ़ाई चिंताकश्मीर घाटी में इस साल सर्दियों के बाद मौसम ने असामान्य रुख अपना लिया है. मार्च के पहले सप्ताह में ही तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर पहुंच गया है, वहीं प्रमुख नदी झेलम का जलस्तर ऐतिहासिक रूप से बेहद नीचे दर्ज किया गया है. यह स्थिति आने वाले समय में खेती और जल संसाधनों के लिए चिंता बढ़ा सकती है. मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, घाटी के ज्यादातर हिस्सों में अधिकतम तापमान सामान्य से 10.8 से 13.7 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया.
श्रीनगर में गुरुवार को अधिकतम तापमान 24.7 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया, जो सामान्य से 11.7 डिग्री ज्यादा है. वहीं, उत्तर कश्मीर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल गुलमर्ग में तापमान 17.2 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड हुआ, जो सामान्य से 13.7 डिग्री अधिक है. स्वतंत्र मौसम विश्लेषक फैजान आरिफ ने कहा कि मार्च के पहले हफ्ते में गुलमर्ग में इतना अधिक तापमान दर्ज होना अब तक का पहला मामला है.
उन्होंने बताया कि वर्तमान तापमान आमतौर पर मई के आखिरी हिस्से में दर्ज होने वाले औसत के बराबर है. घाटी के अन्य इलाकों में भी तापमान में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई है. काजीगुंड में अधिकतम तापमान 24.6 डिग्री, पहलगाम में 20.8 डिग्री दर्ज हुआ, जो सामान्य से क्रमश: 12 और 10.8 डिग्री ज्यादा है. कुपवाड़ा और कोकेरनाग में भी तापमान सामान्य से 11 डिग्री से अधिक ऊपर रहा.
उन्होंने कहा कि इस साल कश्मीर में सर्दियों का मौसम भी सामान्य नहीं रहा. दिसंबर से फरवरी के बीच घाटी में सामान्य से लगभग 65 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई, जहां इस अवधि में सामान्य तौर पर करीब 284.9 मिमी बारिश होती है, वहीं इस बार केवल 100.6 मिमी बारिश ही हुई. कम बर्फबारी और बारिश के कारण घाटी की कई नदियों और जल स्रोतों का जलस्तर भी घट गया है.
इसी क्रम में झेलम नदी का जलस्तर भी चिंताजनक रूप से नीचे चला गया है. गुरुवार सुबह संगम में नदी का स्तर 0.86 फीट दर्ज किया गया, जो शून्य गेज स्तर से भी नीचे है. मार्च के शुरुआती दिनों में इतना कम जलस्तर दिखना सामान्य स्थिति नहीं है. फैजान आरिफ ने कहा कि आमतौर पर सर्दियों या शुरुआती वसंत में गर्मी बढ़ने पर पहाड़ों की बर्फ पिघलने से झेलम का जलस्तर 5 से 8 फीट तक बढ़ जाता था, लेकिन इस बार ऐसा प्रभाव नहीं दिखा. इसका संकेत है कि इस सर्दी में पहाड़ों पर बर्फ का संचय काफी कम हुआ है. अगर आने वाले हफ्तों में पर्याप्त बारिश या बर्फबारी नहीं होती है तो इसका असर खेती पर भी पड़ सकता है.
कश्मीर में धान की नर्सरी की तैयारी आमतौर पर अप्रैल और मई में शुरू होती है, जिसके लिए नदियों और नहरों से मिलने वाले पानी पर काफी निर्भरता रहती है. जल उपलब्धता कम होने की स्थिति में शुरुआती बुवाई और नर्सरी तैयार करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. फिलहाल झेलम के घटते जलस्तर को विशेषज्ञ इस वर्ष की कमजोर जल स्थिति का शुरुआती संकेत मान रहे हैं. लेकिन अगर अगले कुछ हफ्तों में मौसम में बदलाव होता है और बारिश बढ़ती है तो स्थिति में कुछ सुधार की संभावना है. (पीटीआई)
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