
कभी कोदो-कुटकी जैसे पौष्टिक मिलेट्स को बेहद कम कीमत पर स्थानीय व्यापारियों को बेचने के लिए मजबूर रहने वाली जबलपुर जिले की आदिवासी महिलाएं आज आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल बन गई हैं.मेहनत, प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग के बल पर इन महिलाओं ने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की है, बल्कि एक सफल उद्यमी के रूप में अपनी पहचान भी स्थापित की है.
जबलपुर के चरगवां रोड स्थित करेली गांव की लगभग 90 आदिवासी महिलाओं ने मिलकर ऐसा कारोबार खड़ा किया है, जो आज ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है.ये महिलाएं अब केवल कच्चे मिलेट्स की बिक्री तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन का पूरा कार्य स्वयं संभाल रही हैं. परिणामस्वरूप उनकी आय में कई गुना वृद्धि हुई है और वे हर माह 70 हजार रुपये से लेकर 1.25 लाख रुपये तक का कारोबार कर रही हैं.
इस सफलता के पीछे राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लोक कल्याण भूमिका समिति की अध्यक्ष रेखा कुशवाहा बताती हैं कि नाबार्ड के सहयोग और पूर्व जिला विकास प्रबंधक अपूर्व गुप्ता के मार्गदर्शन में महिलाओं को व्यवस्थित रूप से प्रशिक्षण दिया गया.
महिलाओं को मिलेट्स की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग की बारीकियों से परिचित कराया गया. इससे पहले महिलाएं अपने उत्पादों को बिचौलियों के माध्यम से बेचती थीं, जिससे उन्हें उचित मूल्य नहीं मिल पाता था. प्रशिक्षण के बाद उन्होंने उत्पादों में मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) करना सीखा और सीधे बाजार तक पहुंच बनाकर बेहतर आय अर्जित करना शुरू किया.
नाबार्ड द्वारा महिलाओं के समूह को 10 लाख 20 हजार रुपये की सहायता राशि उपलब्ध कराई गई. इस राशि से ओवन, पॉलिशिंग मशीन और पैकेजिंग मशीन जैसी आधुनिक उपकरण खरीदे गए.
इन मशीनों की मदद से महिलाएं अब बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार कर रही हैं.आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण के संयोजन ने उनके उत्पादों की गुणवत्ता और बाजार में स्वीकार्यता दोनों को बढ़ाया है.
प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को केवल कच्चे मिलेट्स की पैकिंग तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उन्हें मिलेट्स आधारित वैल्यू एडेड उत्पाद तैयार करने की भी जानकारी दी गई.
आज ये महिलाएं रागी, कोदो और कुटकी जैसे पोषक अनाजों से स्वादिष्ट कुकीज और नूडल्स तैयार कर रही हैं. इन उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है और जबलपुर के अलावा इंदौर, भोपाल और छिंदवाड़ा जैसे बड़े शहरों में भी इनकी आपूर्ति की जा रही है.
महिलाओं ने सामूहिक रूप से “श्री अन्न महिला मंडल समिति” नाम से अपना ब्रांड विकसित किया है.इस ब्रांड के तहत तैयार उत्पाद बाजार में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं.
एक समय था जब इन महिलाओं ने पैकेजिंग मशीन, माइक्रोवेव या मार्केटिंग जैसी चीजों के बारे में कभी नहीं सोचा था, लेकिन आज वे उत्पादन से लेकर बिक्री तक की पूरी प्रक्रिया का संचालन स्वयं कर रही हैं.
करेली गांव की इन आदिवासी महिलाओं की सफलता यह साबित करती है कि सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और वित्तीय सहयोग मिलने पर ग्रामीण महिलाएं भी बड़े स्तर पर उद्यमिता में सफलता हासिल कर सकती हैं.
“श्री अन्न महिला मंडल समिति” की यह पहल न केवल महिलाओं की आय बढ़ाने में सफल रही है, बल्कि यह ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता और मिलेट्स आधारित उद्यमिता का एक प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरी है. आज ये महिलाएं अपने क्षेत्र की अन्य महिलाओं के लिए भी उम्मीद और प्रेरणा की नई किरण बन चुकी हैं.
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