Farmer invention: बिजली का बिल 0 और फल-सब्जी, दूध रहेगा एकदम फ्रेश, किसान का देसी फ्रिज उड़ा देगा आपके होश

Farmer invention: बिजली का बिल 0 और फल-सब्जी, दूध रहेगा एकदम फ्रेश, किसान का देसी फ्रिज उड़ा देगा आपके होश

जैसे मार्च और अप्रैल का महीना आता है, राजस्थान में सूरज आग उगलने लगता है. पारा 45 से 50 डिग्री के बीच पहुंच जाता है और इस भीषण गर्मी में सबसे बड़ी समस्या होती है खाने-पीने की चीजों को खराब होने से बचाना. शहरों में तो लोग महंगे एयर-कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर का सहारा लेते हैं, लेकिन गांवों में बिजली की कटौती और भारी-भरकम बिजली बिल लोगों की कमर तोड़ देते हैं. लेकिन क्या आप यकीन करेंगे कि बारां जिले के एक छोटे से गांव में एक किसान ने ऐसा 'अनोखा देशी फ्रिज' तैयार किया है, जिसमें न तो कोई तार है, न प्लग और न ही यह बिजली से चलता है.

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बिजली का बिल 0 और फल-सब्जी, दूध रहेगा एकदम फ्रेश, किसान का देसी फ्रिज उड़ा देगा आपके होशकिसान ने बनाया देसी फ्रिज

राजस्थान के बारां जिले के शाहाबाद ब्लॉक स्थित गुदरमल गांव के निवासी हेमराज भील ने अपनी पारंपरिक जड़ों से जुड़कर आधुनिक युग की एक बड़ी समस्या का बेहद सरल समाधान निकाला है. पिछले 20 साल के अपने अनुभव और ग्रामीण कौशल के दम पर 'ओरहाणा' नामक मिट्टी का एक ऐसा प्राकृतिक फ्रिज पुनर्जीवित किया है, जो पूरी तरह बिना बिजली के काम करता है. कम लागत वाला यह फ्रिज दूध, दही और फल सब्जियों को 36 घंटे तक ताजा रखता है. यह नवाचार इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि भारत के गांवों का हुनर और हमारी प्राचीन तकनीकें आज की कृत्रिम तकनीकों से कई मायनों में बेहतर हैं.

जहां आधुनिक रेफ्रिजरेटर भारी बिजली की खपत करते हैं, जिससे जेब पर बोझ बढ़ता है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है, वहीं 'ओरहाणा' पूरी तरह इको-फ्रेंडली है. फ्रिज से निकलने वाली गैसें और अत्यधिक ठंडा तापमान अक्सर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, लेकिन मिट्टी से बना यह प्राकृतिक ढांचा भोजन की पौष्टिकता को बनाए रखता है. हेमराज का यह प्रयास संसाधनों की बचत कर रहा है. इसे बनाने के लिए किसी फैक्ट्री या बड़ी मशीन की जरूरत नहीं पड़ी, बल्कि गांव के ही हुनर ने इसे मुमकिन कर दिखाया है.

मिट्टी, पानी और देसी हुनर का आर्गेनिक फ्रिज

अब आपके मन में सवाल उठ रहे होंगे कि आखिर क्या है वह तकनीक? इसे बनाने में किन खास चीजों का इस्तेमाल होता है?  राजस्थान के 40 वर्षीय किसान हेमराज का यह नवाचार तकनीकी रूप से उपयोगी है जो पूरी तरह इको-फ्रेंडली और किफायती भी है. लुप्त होती ग्रामीण परंपरागत तकनीक कितनी फायदेमंद है, यह उसके महत्व को दर्शाता है. इस संरचना की सबसे बड़ी खास बात यह है कि इसको बनाने में किसी भी कृत्रिम पदार्थ का उपयोग नहीं होता, बल्कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध काली मिट्टी, गेहूं का भूसा और पानी के मिश्रण का उपयोग किया जाता है. अनुभवी ग्रामीण महिलाओं द्वारा हाथों से तैयार किए गए इस बॉक्सनुमा ढांचे का आकार लगभग 1.5 फीट चौड़ा और 2 फीट ऊंचा होता है. इसे बनाने में लगभग 6 दिन का समय लगता है.

बिना बिजली अब गांव में भी ताजा रहेगा दूध-दही

इस नवाचार का सबसे खास पहलू यह है कि यह नेचुरल रूप से ठंडा करने वाला सिस्टम है. इसमें कुछ ऐसे 'सीक्रेट होल्स' और प्राकृतिक मिश्रण का इस्तेमाल किया गया है, जो बाहर की गर्म हवा को अंदर जाते ही 'एसी' जैसी ठंडक में बदल देते हैं. हैरानी की बात यह है कि इसकी लागत बहुत मामूली है, लेकिन इसके फायदे लाखों के उपकरण जैसे हैं. 'ओरहाणा' की चारों दीवारों पर लगभग 80 से 100 छोटे-छोटे छेद या 'वेंटिलेशन होल' बनाए जाते हैं. ये छेद वैज्ञानिक रूप से हवा के निरंतर आवागमन सुनिश्चित करते हैं. जब बाहर की हवा इन छिद्रों से होकर गुजरती है, तो मिट्टी की नमी और प्राकृतिक वाष्पीकरण के कारण अंदर का तापमान बाहर की तुलना में काफी कम बना रहता है.

इस तकनीक की मदद से बिना एक यूनिट बिजली खर्च किए, खाद्य सामग्री 24 से 36 घंटों तक पूरी तरह ताजा बनी रहती है. यह उन इलाकों के लिए क्रांतिकारी है जहां बिजली की कटौती एक बड़ी समस्या है.

देसी फ्रिज के आगे बड़ी-बड़ी मशीनें भी फेल!

आर्थिक नजरिये से देखा जाए तो 'ओरहाणा' एक बेहद सस्ता विकल्प है जहां एक सामान्य फ्रिज की कीमत 10,000 रुपये से शुरू होती है और हर महीने बिजली का बिल आता है, वहीं 'ओरहाणा' मात्र 1200 रुपये की लागत में बनकर तैयार हो जाता है. इसमें कोई रखरखाव खर्च नहीं है और न ही किसी मशीनरी की जरूरत होती है. इसके निर्माण से गांव की महिलाओं को रोजगार मिलता है. 

यह "वोकल फॉर लोकल" का एक सटीक उदाहरण है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ गरीब परिवारों को महंगे उपकरणों के बोझ से मुक्त करता है. यह बिजली विहीन आदिवासी क्षेत्रों के लिए एक वरदान साबित हुआ है. यह साबित करता है कि स्थानीय संसाधनों और बुजुर्गों के अनुभव से निकले समाधान न केवल सस्ते और टिकाऊ हैं, बल्कि हमारी सेहत और धरती दोनों के लिए सबसे उत्तम हैं.

देसी रेफ्रिजरेटर को बढ़ावा देने की जरूरत

हेमराज भील का यह नवाचार केवल एक गांव तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इसकी सफलता को देखते हुए अब इसे महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण नवाचार मंचों के माध्यम से बड़े स्तर पर प्रचारित करने की जरूरत है. हालांकि इसकी उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है, लेकिन यदि इसका वैज्ञानिक सत्यापन किया जाए और तापमान नियंत्रण की सटीक क्षमता को मापा जाए, तो इसे शहरी क्षेत्रों में भी 'ऑर्गेनिक लाइफस्टाइल' अपनाने वाले लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया जा सकता है. यह टिकाऊ जीवन शैली और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है.

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