
मध्य प्रदेश में समर्थन मूल्य पर खरीदे गए गेहूं में कमी को लेकर उठे सवालों के बीच राज्य सरकार ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है.खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने कहा है कि गेहूं खरीदी के बाद तुलाई, परिवहन और भंडारण जैसी प्रक्रियाओं के दौरान कुछ मात्रा में कमी आना सामान्य प्रक्रिया है. हालांकि जहां भी वास्तविक कमी पाई जाएगी, उसकी भरपाई संबंधित समितियों और परिवहनकर्ताओं से कराई जाएगी.
मंत्री के निर्देश पर अपर मुख्य सचिव खाद्य रश्मि अरुण शमी ने सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश जारी किए हैं कि जिला स्तरीय उपार्जन समितियां प्रत्येक मामले की जांच करें, कमी के कारणों की पहचान करें और दोषी समितियों अथवा परिवहनकर्ताओं से वसूली सुनिश्चित करें.
सरकार के अनुसार, पिछले वर्षों में समर्थन मूल्य पर खरीदे गए गेहूं में औसतन 176 ग्राम प्रति क्विंटल की कमी दर्ज होती थी. जबकि रबी विपणन वर्ष 2026-27 में यह औसत घटकर 70 ग्राम प्रति क्विंटल रह गई है.सरकार का दावा है कि इस वर्ष पिछले साल की तुलना में करीब 30 प्रतिशत अधिक गेहूं की खरीदी हुई, इसके बावजूद कमी का औसत पहले से काफी कम रहा.
सरकार ने स्पष्ट किया है कि समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीदी सीधे नागरिक आपूर्ति निगम नहीं करता. यह कार्य पंजीकृत सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से किया जाता है.पूरी प्रक्रिया जिला कलेक्टर की अध्यक्षता वाली जिला स्तरीय उपार्जन समिति की निगरानी में संचालित होती है.
सरकार का कहना है कि खरीदी के बाद यदि किसी जिले में वास्तविक कमी सामने आती है तो जिला उपार्जन समिति उसकी जांच करेगी. सत्यापन के बाद शासन को होने वाली संभावित आर्थिक क्षति की भरपाई संबंधित सहकारी समितियों, स्वयं सहायता समूहों और परिवहनकर्ताओं से वसूली कर की जाएगी.
सरकार ने सागर जिले के आंकड़े भी जारी किए हैं. यहां वर्ष 2026-27 में 49 हजार से अधिक किसानों से लगभग 36.20 लाख क्विंटल गेहूं खरीदा गया. पिछले वर्षों में जिले में औसतन 510 ग्राम प्रति क्विंटल की कमी दर्ज होती थी, जबकि इस वर्ष यह घटकर 318 ग्राम प्रति क्विंटल रह गई है. यानी पिछले वर्ष की तुलना में 192 ग्राम प्रति क्विंटल कम कमी दर्ज की गई है.
खाद्य विभाग के अनुसार, वर्तमान में सभी जिलों में जिला स्तरीय उपार्जन समितियां कमी की पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी कर रही हैं. जांच पूरी होने के बाद जहां भी वास्तविक कमी मिलेगी, वहां संबंधित एजेंसियों और परिवहनकर्ताओं से उसकी वसूली की जाएगी, ताकि शासन को किसी प्रकार की आर्थिक क्षति न हो.
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