
मोरबी में किसानों का विरोध प्रदर्शन शुरूगुजरात के मोरबी जिले में गुरुवार को जेतपर गांव के किसानों ने अपना आंदोलन तेज कर दिया. इसी के साथ किसानों के आंदोलन का पार्ट-2 शुरू हो गया है. गुरुवार से किसान आमरण अनशन पर हैं और ऐलान किया है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं, वे अपना आंदोलन जारी रखेंगे. किसान अपने खेतों से गुजरने वाली बिजली लाइनों के लिए मुआवजे की मांग कर रहे हैं और इसके खिलाफ उनका आमरण अनशन शुरू हुआ है.
पिछले पंद्रह दिनों से मोरबी तहसील के जेतपर गांव के किसान बिजली कंपनी के खिलाफ मुआवजा पाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं. अलग-अलग तरीकों से विरोध करने के बाद, सरकार और कंपनी द्वारा किसानों को सही मुआवजा न देने और उनकी मांगें पूरी न करने पर किसानों ने आंदोलन का पार्ट-2 शुरू कर दिया है. किसानों ने साफ कहा है कि अगर सरकार और कंपनी ने सही मुआवजा नहीं दिया, तो आने वाले दिनों में किसान गांधीगिरी बंद कर सरदारगिरी करेंगे.
अनशन पर बैठे किसान नेता विजयभाई ने कहा कि जिस किसान को दुनिया “अन्नदाता” कहती है, आज वही अन्न छोड़कर सड़कों पर बैठने को मजबूर है, जो बेहद दुखद स्थिति है. उन्होंने कहा कि किसानों की मांगें बहुत छोटी और जायज हैं, जिन्हें संविधान के तहत रखा जा रहा है, लेकिन राज्य का सरकारी तंत्र उनका दमन कर रहा है. विजयभाई ने आरोप लगाया कि बिना उचित मुआवजा दिए और किसानों की सहमति के बिना जबरन खेतों में खंभे लगाए जा रहे हैं, जो अंग्रेजों के दौर जैसी जबरदस्ती है. उन्होंने इसे तानाशाही करार देते हुए कहा कि यह लोकतंत्र के खिलाफ है.
उन्होंने बताया कि अपनी मांगों को लेकर पांच किसान आमरण अनशन पर बैठे हैं, जबकि हजारों लोग प्रतीकात्मक धरने में शामिल हैं. आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज होने की चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि जब तक मांगें पूरी नहीं होंगी, तब तक आंदोलन जारी रहेगा. विजयभाई ने कहा कि किसान आखिरी सांस तक लड़ेंगे. उन्होंने सरकार और कंपनियों को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर शांतिपूर्ण तरीके से (गांधीगिरी से) समाधान नहीं निकला, तो किसान सख्त कदम उठाने को भी मजबूर होंगे.
उन्होंने कहा कि किसान वही है जो एक बीज से अनाज पैदा करता है और जरूरत पड़ने पर अपने अधिकार के लिए हर संघर्ष कर सकता है. आने वाले समय में किसान अपनी ताकत दिखाएगा.
आंदोलन में महिलाओं की भूमिका पर बोलते हुए किसान नेता जूली अमृतिया ने कहा कि यह आंदोलन पिछले 15 दिनों से लगातार चल रहा है और शुरुआत से ही सभी गांवों की महिलाएं सक्रिय रूप से इसमें शामिल हैं. उन्होंने कहा कि खेतों में काम से लेकर रोड और हाईवे जाम करने जैसे हर कार्यक्रम और रणनीति में महिलाओं ने बराबर भागीदारी निभाई है.
उन्होंने बताया कि जब गांधीनगर जाने का निर्णय लिया गया, तब भी करीब 200 महिलाएं वहां पहुंचीं. अब आमरण अनशन के दौरान भी महिलाएं पूरी मजबूती के साथ आंदोलन में डटी हुई हैं और जब तक आंदोलन जारी रहेगा, उनका समर्थन बना रहेगा. जूली अमृतिया ने कहा कि महिलाएं घर की जिम्मेदारियां निभाने के बाद—बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल करने के साथ—पूरे दिन धरनास्थल पर मौजूद रहती हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी गांवों की महिलाएं इस आंदोलन को अंत तक समर्थन देती रहेंगी.

अपनी मांगों पर उन्होंने कहा कि किसानों को उनकी जमीन की वास्तविक कीमत के अनुसार मुआवजा दिया जाना चाहिए, न कि सरकारी जंत्री (सर्किल रेट) के हिसाब से. उन्होंने कहा कि जंत्री के मुताबिक मिलने वाली कीमत बेहद कम है और उससे किसानों को उचित लाभ नहीं मिल पाता. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब जमीन की असली कीमत कहीं ज्यादा है, तो किसानों को कम दर पर मुआवजा क्यों दिया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यदि सरकार जंत्री दर से ही भुगतान करना चाहती है, तो किसान भी उसी अनुसार अन्य सुविधाओं और विकल्पों की मांग करेंगे.
जूली अमृतिया ने सुझाव दिया कि यदि उचित मुआवजा नहीं दिया जा सकता, तो सरकार किसानों की जमीन को किराए पर ले और तय दर के अनुसार मासिक भुगतान करे. उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से बड़े प्रोजेक्ट्स में पार्किंग के लिए किराया लिया जाता है, उसी आधार पर किसानों को भी उनकी जमीन के उपयोग का उचित किराया मिलना चाहिए. (राजेश अंबालिया की रिपोर्ट)
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