
उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के उडला जागीर गांव की सलमा महिला सशक्तीकरण की एक प्रेरक मिसाल हैं. पहले उनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था और पढ़ाई के बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिल रही थी. बाद में उन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत बीसी सखी बनने का मौका लिया. प्रशिक्षण के बाद उन्हें 75,000 रुपये का सपोर्ट फंड मिला और उन्होंने गांव में बीसी सखी सेंटर शुरू किया. अब वे हर महीने लगभग 35,000 रुपये कमा रही हैं. उनके सेंटर से गांव के लोगों को बैंकिंग और डिजिटल लेनदेन की सुविधा मिल रही है. सलमा अब आत्मनिर्भर बनकर अपने परिवार और गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं.

कर्नाटक के शिवमोग्गा की 45 वर्षीय अरुणा देवी एक शिक्षित महिला किसान हैं, जिन्होंने बीएससी कृषि और एलएलबी की पढ़ाई के बाद वकालत भी की. लेकिन उनका मन खेती और पशुपालन में था. साल 2021 में उन्होंने 18 लाख रुपये निवेश कर भेड़ पालन शुरू किया. उन्होंने पारंपरिक तरीके के बजाय “सिंगल सेल रैम फार्मिंग” तकनीक अपनाई, जिसमें हर भेड़ को अलग पिंजरे में रखा जाता है, जिससे बीमारी और लड़ाई कम होती है. वे 6–8 हजार रुपये में मेमने खरीदकर 6 महीने में उन्हें लगभग 22–23 हजार रुपये में बेच देती हैं. इस वैज्ञानिक तरीके से वे हर साल 100 भेड़ें बेचकर अच्छा मुनाफा कमा रही हैं.

उत्तर प्रदेश में महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता तेजी से बढ़ रही है. लखपति दीदी योजना और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं नए रोजगार शुरू कर रही हैं और अच्छी कमाई कर रही हैं. आजमगढ़ की हुस्नआरा खातून रेशमी साड़ी बनाकर हर महीने लगभग एक लाख रुपये कमा रही हैं, वहीं शशिकला राजभर ने फास्ट फूड स्टॉल शुरू कर अपनी आय बढ़ाई है. बीसी सखी जैसी पहल से महिलाएं गांवों में बैंकिंग और डिजिटल सेवाएं भी पहुंचा रही हैं. प्रदेश में 9 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह बन चुके हैं और लगभग 18 लाख महिलाएं लखपति बन चुकी हैं. इससे महिलाओं का आत्मविश्वास और आर्थिक सशक्तीकरण दोनों मजबूत हुए हैं.

जमशेदपुर में जिला कृषि विभाग की पहल पर ग्रामीण महिलाओं को देसी ओएस्टर मशरूम उत्पादन की ट्रेनिंग दी गई. इसमें खेतों की पराली यानी पुआल का उपयोग किया जा रहा है, जिसे कई जगह जलाया जाता है. महिलाओं ने पुआल को साफ करके प्लास्टिक बैग में मशरूम के बीज डालकर उत्पादन शुरू किया. लगभग 30 दिनों में मशरूम तैयार हो जाता है और बाजार में इसकी कीमत करीब 400 रुपये प्रति किलो मिलती है. दिघी गांव की ज्योत्सना महतो ने पहली ही फसल में करीब एक लाख रुपये तक की कमाई की. यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण के साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए नया रोजगार और अच्छी आमदनी का जरिया बन रहा है.

झारखंड के हजारीबाग जिले के हरहद गांव में 10 महिला किसानों ने मिलकर बंजर जमीन पर मिश्रित खेती शुरू कर नई मिसाल पेश की है. महिलाओं ने करीब 10 एकड़ जमीन को जैविक खाद से उपजाऊ बनाया और वहां फल व सब्जियों की खेती शुरू की. वे अमरूद, आम, पपीता, अनानास और शरीफा के साथ भिंडी, टमाटर और बैंगन जैसी सब्जियां उगा रही हैं. इससे उन्हें सालभर आय का स्रोत मिल रहा है. इस पहल में लीड्स संस्था और जेएसएलपीएस ने प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता दी. महिलाओं की यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है और अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है.

असम के नगांव जिले की एमएससी शिक्षित गार्गी गीतम बोराह ने खेती और मत्स्य पालन में एक अनोखा नवाचार किया है. उन्होंने छोटी मछलियों के पोषण को चॉकलेट के स्वाद के साथ मिलाकर “फिश चॉकलेट” तैयार की है. इसमें मछली को साफ कर उसका पेस्ट बनाकर चॉकलेट में मिलाया जाता है, जिससे स्वाद मीठा रहता है और मछली की गंध नहीं आती. यह उत्पाद प्रोटीन और पोषक तत्वों से भरपूर है, जो बच्चों और महिलाओं में कुपोषण कम करने में मदद कर सकता है. लगभग 400 रुपये की लागत में बनने वाली यह चॉकलेट स्वरोजगार और मत्स्य क्षेत्र में वैल्यू एडिशन का अच्छा उदाहरण है.

महाराष्ट्र के बीड जिले की सूखाग्रस्त मिट्टी में आष्टी तालुका की मंदाकिनी नानासाहेब गव्हाणे ने जैविक कद्दू (डांगर भोपला) की सफल खेती कर मिसाल कायम की है. उन्होंने प्रति एकड़ केवल 7 हजार रुपये खर्च करके 8 महीनों में तीन बार फसल ली और कुल 45 टन उत्पादन हासिल किया. मंदाकिनी ताई ने रासायनिक उर्वरक छोड़कर स्वयं बनाई जैविक खाद और प्राकृतिक छिड़काव का प्रयोग किया. उनके उगाए कद्दू की मांग महाराष्ट्र सहित पांच अन्य राज्यों में बढ़ गई है. उनकी यह पहल कम लागत, कम पानी और जैविक तरीकों से मुनाफा कमाने का प्रेरक उदाहरण बन गई है.

उत्तर प्रदेश की शिखा सिंह चौहान और सोम्या सिंह ने मिलेट्स आधारित ऑर्गेनिक फूड स्टार्टअप शुरू कर महिलाओं को रोजगार और किसानों को उचित मूल्य देने का मॉडल पेश किया है. यह फार्म-टू-फोर्क स्टार्टअप छोटे किसानों से सीधे कच्चा माल खरीदता है और उपभोक्ताओं को शुद्ध, रसायन-मुक्त और पोषण से भरपूर उत्पाद देता है. दिल्ली-एनसीआर में मजबूत पकड़ बनाने के बाद अब उनका लक्ष्य गल्फ देशों का बाजार है. उनकी यूनिट में 15 से अधिक महिलाएं उत्पादन, प्रोसेसिंग और पैकेजिंग संभाल रही हैं. यह पहल महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य और सतत कृषि की मिसाल बन रही है.
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