
सोनभद्र जिले के आदिवासी जिस वन भूमि पर गुजर बसर और खेती कर रहे हैं, उस भूमि को सरकार से कई वर्षों से अपने अधिकार स्वरूप मांग रहे हैं. ऐसे में जंगली भूमि के जोत कोण के लिए लगातार स्थानीय स्तर पर प्रशासन से छोटी बड़ी लड़ाइयां भी होती रहती है.

जंगली भूमि पर पशु चराने और खेती करने की वजह से वन विभाग से कभी-कभी आमना सामना होने के वजह से संघर्ष में जान तक चली जाती है. लेकिन, अब सरकार उन सभी जमीनों को आदिवासी को सौंप रही है, जिन जमीनों पर आदिवासी रह रहे हैं.

गरीबी और पिछड़ेपन की वजह से यहां के 90 प्रतिशत आदिवासी किसान बैलों से पुराने तरीकों की खेती कर रहे हैं. यहां बैल, हल वो औजार है, जिससे खेती की जाती है.

वहीं, 10 से 15 प्रतिशत आदिवासी कृषि कार्य में तकनीकी उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं. हल का प्रयोग कम होता जा रहा है. हल का स्थान अब ट्रैक्टर ने ले लिया है, जिससे कृषि कार्य में कम मेहनत में अच्छी तरह से खेत की जुताई हो जाती है.

सोनभद्र की भौगोलिक स्थिति देखें तो यहां नदियों और पहाड़ों के कारण समतल एवं कृषि योग्य भूमि का अभाव है. कृषि कार्य को अधिक महत्व दिया जा रहा है. जिले में सबसे ज्यादा पहाड़ी इलाका होने की वजह से यहां दलहन की खेती ही होती है. अरहर, चना, मक्का, बजरा मटर आदि फसलों की पैदावार अच्छी खासी मात्रा में होती है.

सबसे ज्यादा अच्छी बात है कि हल के खेती से बैलों का प्रयोग होने की वजह से फसलों को अपने हाथों से ही हंसुआ बाली से ही काटते हैं और मड़ाई के दौरान जानवरों के लिए आदिवासी किसान चारे का भी आसानी से प्रबंध कर लेते हैं, जिससे इन इलाकों में छुट्टे जानवरों की समस्या नहीं होती है.

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