
राजस्थान के बूंदी जिले का चावल उद्योग इन दिनों अंतरराष्ट्रीय हालात की मार झेल रहा है. ईरान और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध ने यहां के चावल व्यापार पर गहरा असर डाला है. विदेशी बाजारों में अपनी अलग पहचान बना चुका बूंदी का चावल अब गोदामों तक सीमित होकर रह गया है.

दरअसल, बूंदी से बड़ी मात्रा में चावल का निर्यात खाड़ी देशों, विशेष रूप से ईरान और आसपास के क्षेत्रों में होता रहा है. लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद से निर्यात गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं. व्यापारियों के अनुसार, जैसे ही युद्ध की स्थिति बनी, विदेशी खरीदारों ने ऑर्डर रोक दिए और नए सौदों से दूरी बना ली.

युद्ध के कारण बंदरगाहों से माल की ढुलाई भी प्रभावित हुई है. कांडला पोर्ट से चावल की लोडिंग नहीं हो पा रही है, जिससे बड़ी मात्रा में तैयार माल गोदामों में ही पड़ा हुआ है. इस स्थिति ने व्यापारियों और मिलर्स की चिंता बढ़ा दी है. बूंदी में हर साल करीब 2200 से 2300 करोड़ रुपये का चावल व्यापार होता है. यहां लगभग 26 राइस मिल यूनिट संचालित हैं. ऐसे में निर्यात रुकने से पूरे उद्योग पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं.

स्थिति को और गंभीर बनाते हुए बीमा कंपनियों ने भी जोखिम बढ़ने के कारण व्यापारियों को माल लोड करने और निर्यात करने से मना कर दिया है. इससे व्यापारी न तो नया माल भेज पा रहे हैं और न ही पुराने स्टॉक को निकाल पा रहे हैं.

स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि यदि युद्ध जल्द थमता है तो व्यापार में फिर से तेजी आ सकती है. हालांकि, यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर और गहरा हो सकता है, जिससे चावल उद्योग को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है.

बूंदी का बासमती चावल खाड़ी देशों में काफी पसंद किया जाता है. लेकिन वर्तमान हालात में शिपिंग रुकने और व्यापार बाधित होने के कारण यह चावल न तो निर्यात हो पा रहा है और न ही बाजार तक पहुंच पा रहा है.

कुल मिलाकर, अंतरराष्ट्रीय युद्ध ने स्थानीय स्तर पर बड़े आर्थिक प्रभाव डाले हैं. बूंदी का चावल उद्योग फिलहाल अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है और सभी की निगाहें युद्ध समाप्त होने पर टिकी हैं, ताकि व्यापार एक बार फिर पटरी पर लौट सके.(इनपुट-भवानी सिंह हाड़ा, ग्राफिक्स-संदीप भारद्वाज)
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